नहीं करनी मुझे शादी ना होना मुझे पराई है
कैसे मैं तुझसे दूर रहूंगी मां जब सोच आंख मेरी भर‌ आई है
सुनकर बेटी की बात मां धीरे से मुस्काती है
पास बुला बैठा प्यार से उसको मां समझाती है
ये रीत पुरानी है बिटिया जिसे हम सबको निभाना पड़ता है
आज नहीं तो कल बेटी को अपने घर जाना हीं पड़ता है
ये सिर्फ तुम्हारी ही नही यहां हम सबकी यहीं कहानी है
जिसे बड़ा किया अरमानों से वो बेटी एक दिन ब्याहनी ह
 अपनी क्षमता से ज्यादा हम वर तुम्हारा ढूंढेंगे
कह रहीं हो जिन्हें पराया वो हमसे खुश रखेंगे
इस घर से जितना स्नेह मिला उस घर को भी उतना देना
कोई गुस्से में कुछ कह भी दें तो तुम दिल पर मत लेना
जो आभुषण जहां के लिए बना हों वो उसी जगह सस्ता है
और ने लोगों के बीच जगह बनाने में बिटिया थोड़ा वक्त तो लगता है
डोली में कर विदा बस अर्थी में वापस आना
कभी हृदय आहत भी‌ हों तो भी तुम खुद ही खुद को समझाना
धीरे धीरे एक दिन तुम उस घर के रंग में रंग जाओगी
इस घर के लिए पराई और उस घर का हिस्सा बन जाओगी
सारी गांठों की गांठ बांध मां सब संग अपने मैं लें आई थी
पर ना जाने क्यों इस घर में भी और उस घर में मैं ही पराई थी
हर काम में करना चाहती हूं जो मुझे नहीं भी आता है
पर थोड़ी भी गलती हो जाना जैसे यहां गुनाह हो जाता है
करता यहीं सिखाया मां ने तुम्हारी
हर रोज सब मुझसे कहते हैं सब छोड़ आई जिनकी खातिर वो भी चुप रहते हैं
सुबह सवेरे जल्दी उठकर हर काम मैं अपना निपटाती हूं
कोशिश करके हार गई मां पर मन जीत ना पाती हूं
अपने सारे अरमानों की मैं फिर एक चादर ओढ़ सो जाती हूं
समझाया था तुमने जैसा वैसा तो कुछ भी ना पाती हूं
हर रोज आंख नम होती है हर रोज हृदय भर आता है
बहु भी बेटी होती है कोई क्यों समझ ना पाता है
कहने को हर रिश्ता अपना पर अपनेपन से कोसों दूरी है
ये कैसी रीत है दुनिया की मां कैसी मेरी मजबूरी है



                    पूनम लोहार
                    राजस्थान