सफर खत्म हुआ
आखिरी पड़ाव है
जीवन धारा थम सी गई
ये कैसा बहाव है
  सांसो का दौर
चलता, फिर रुक जाता
  रुकते रुकते कुछ कह जाता
कहता-दूर न हमसे जाना
कुछ दिनों के मेहमान हैं
  पास बैठो हमारे
बस यही अरमान हैं।
     तुम्हारे हाथ से नहाता
     तुम्हारे हाथ से खाता
पहले तुम बेटी थी हमारी
     अब  बन गई हो माता।
 हाथ जोड़ कर वो जब
           ये सब कहते,
  मैं ठहर नही पाती थी
 देख कर उनकी ये हालत
  मैं पल पल मर जाती थी।
उनका बे बस ओर 
           असहाय होना
      मेरी पीड़ा बनती गई,
कल आज ओर कल को
मैं धीरे धीरे समझती गई।
ये कर्ज हैं माँ बाप का
    जो उतार रहे हैं
बड़प्पन देखो उनका
जो एहसान मान रहे हैं।
आया है जो जाएगा
यही संसार की रीत है
इस रसहीन नीरस जीवन का
    ये कैसा अमर गीत हैं।
जन्म दिया और पाला
क्या मैं यह सब कुछ कर पाई
बार बार जन्म लेकर भी
नही कर सकती मैं
 उनकी भरपाई।

श्यामा सोलंकी