लेकिन भला रुकी है जिंदगी ?
नहीं,किसी की नहीं ,बस
सब कुछ संभालने की जद्दोजहद जारी है
जब मिलगये परिणाम बिन परीक्षा के
तो अगली कक्षा में आने की ख़ुमारी है
असमंजस में विद्यार्थियों संग विद्यालय
लेकिन टीचर ही की इसबार दारमदारी है
बालक पढ़े , न पढें तो क्या
ऑनलाइन कक्षाओं का
सर पर जिम्मा आवश्यम्भारी है
शिक्षक अभिभावकों को ही पढ़ना है
बच्चों ने तो यहाँ भी सेंध मारी है
मेडम बताती मां लिखती जाती
एटेंडेंस लगाते सहमे है पेरेंट्स
टीचर जी नाम पुकारें तो "यस मैडम"
कहते विधार्थी आज्ञाकारी है
बन्द चालू होते ऑडियो वीडियो
बच्चों की तो यही हिस्सेदारी है
चल रही ऑनलाइन क्लासेज
ये तमाशा पढ़ने पढ़ाने का
ओर इसके कभी बन्दर ,
कभी हम ही मदारी है।
लेकिन
विडंबना से
मन उथल पुथल करता जाता है
क्या हालत माता पिता की
जिसके घर बालक चार
फीस पूरी कम है वेतनमान
एक सेकेंड-हैंड मोबाइल
में भी रिचार्ज इंटरनेट प्लान
चंद हज़ार रुपये में मासिक वेतन
ओर अनगिनत सपनें झकझोरती
सांसो से तोड़ती कोरोना महामारी है।।
लाचारी तब बड़े भाई की भी
जिसकी कॉलेज का लेक्चर
ओर छुटकी की बोर्ड परीक्षा
ऊपर से छोटू ओर अंतिमा के
सँग कक्षा एक समय में
घड़ी की सुइयां चलती सँग सारी है।।
बाबा को फैक्ट्री भी है जाना
फोन भी पड़ेगा सँग लेजाना
कैसे संभालू घर का राशन
इतने खर्चे हो कैसे अन्नप्राशन
बेबस ममता परीक्षा हमारी है।।
मेक इन इंडिया डिजिटल हुआ तो है
लेकिन ऑनलाइन क्लासेस में पढ़ते भारत की ज़मीनी हकीकत ये सारी है
क्या है,कैसे करें समाधान,
कब तक का होगा व्यवधान,
दिहाड़ी से हाकमदारों तक
पक्की सड़क से बंजारों तक
आत्मनिर्भर हो आगे बढ़ता इंडिया
आई पेड ,लेपटॉप से पढ़ता इंडिया
वर्क फ्रॉम होम करता इंडिया
सेफ इन्वेस्टमेंट करता इंडिया
Lockdown में शेफ़ बनता इंडिया
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म आज़माता इंडिया
नहीं जान सकता
बिना तनख़्वाह
पूरी फ़ीस भरता है भारत,
सेकेंड हैंड मोबाइल पर बस
सबकी ऑनलाइन क्लास पढ़ता है भारत,
घर छुटा पर बिल्डिंग बनाता है भारत
रोज़गार नही लेकिन उम्मीद रखता है भारत,
बाढ़ से तरबतर लेकिन आंख का पानी सोखता हे भारत,
कपड़ा नहीं पर दामन खुला बुनता हे भारत
मौसम की मार है फ़सल बर्बाद बेज़ार है
खुद पर विश्वास आबाद रखता है भारत
इंडिया में कहीं सुकून ढूंढता है भारत।
भारत को इंडिया बनाने की होड़ में
अंदर ही अंदर मरता है भारत
अंदर ही अंदर रोटा है भारत।।
भारती प्रवीण

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