चुभन लिए खिलते है,
सुमन की कोमल पंखुड़ियां।
कांटे साथ लगे है फिर भी,
हँसती रहती ये कलियाँ।
कलित चमन की आभा में,
दृश्य मनोहर लगता है।
परिदृश्य देख मन में मेरे,
एक सुंदर रचना रचता है।
सुमन सा जीवन मानव के,
खिल के फिर मुरझाते है।
काल चक्र में प्रमोद वेदना,
उपवन से उपमा करते है।
कभी है पतझड़ कभी बहार,
बयार बवंडर आता है।
पर नहीं पिघलता पत्थर,
कितना भी तपता रहता है।
सबल बने उस अबला से,
अजर निलय जो तल पाव में।
निर्ममता से कुसुम नोचते,
चाहे चुभ जाए कांटे हाथ में।
सतेश देव पाण्डेय

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