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वो कुल्हड़ वाली चाय की चुस्कियां
सर्दियों की ठिठुरन ,धूप की अठखेलियां 
याद आती हैं मुझे, मेरे बचपन की वो मस्तियाँ 
रविवार की वो सुबह, देर से उठना
उठकर थोड़ी देर धूप सेकना 
चूल्हे के पास बैठना 
माँ को बार बार तंग करना
नीले आसमान में उड़ती पतंगे 
खेल खेलने की उमंगे 
बेतरतीब बिखरे खिलोने 
गिल्ली डंडे की धूम
छुपन छुपायी खेलते सलोने
हाँ वो कागज की कश्तियाँ 
याद आती है मुझे, मेरे बचपन की वो मस्तियाँ 
घर के आँगन मेँ बैठी गीत गाती 
धूप में पापड़ सुखाती    
मेरी माँ की वो प्यारी बतियां 
याद आती हैं मुझे, मेरे बचपन की वो मस्तियाँ 
पापा का प्यार, प्यार भरी फटकार
बीच बचाव ,दादी का वार 
आपस में होती देख तकरार 
भीग जाती हैं मेरी अखिया 
याद आती है मुझे, मेरे बचपन की वो मस्तियाँ 


कृष्णा की✍️ कलम से