हाँ झाँसी की रानी का ,मेरी महारानी का ।
बडे बडे तहखाने जिसमे ,दरवाजे बडे बडे
जो गाथा गाते है झाँसी की ,वो खम्बे बडे बडे
जहाँ वीरांगना घूमा करती थी ,वो उपवन भी है,
सूयोर्दय से पहले ,उठकर तीर ,तलवार चलाती। ,
रखती थी ध्यान सेहत का अपना ,कसरत करती
तब जाकर देर से वह ,भोजन गृहण,करती थी ।
रानी लक्ष्मीबाई महल मे बना हुआ है एक मंदिर ,
लक्ष्मी नारायण जी की थी ,महारानी उपासक ।
चारो तरह हरियाली बसी थी ,महल तेज से चमकता
जब रानी घुडसवारी सीखे,करे तलवार वाजी वहाँ ।
मैने देखा एक पुराना महल,मेरी रानी का ,
हाँ झाँसी की रानी का ,मेरी महारानी का ।
रानी झाँसी महल मे ,एक सुरंग ऐसी थी ,
जो आपात समय मे दूर दूर तक जाती थी ।
झाँसी का गौरव रानी से ,महल भी खूब इतराये
ऊचे ऊँचे किले के पत्थर ,शौर्य गीत है गाये ।
मै अपनी झाँसी नही दूँगी ,रानी का मोह दिखाये
जब देखे इस महल को हम तो ,नाज करे इतराये ।
मंदिर सा महके आज भी ,गौरवगाथा रानी की गाये
छुडा दिये छक्के अंग्रेजो के,वह महल हमे बताये ।
धन्य धरा वह बसुन्धरा ,जिसमे वह रानी बन आयी
सारी दुनियाँ मे उस झाँसी का नाम अमर कर आयी ।
मैने देखा एक पुराना महल मेरी रानी का ,
हाँ झाँसी की रानी का ,मेरी महारानी का ।
मीनाक्षी शर्मा
भोपाल,मध्यप्रदेश

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