मन विहग के पंख समेटूं, हर पीड़ा को सखी बनाऊं
भाग्य पवन से संधि रचाऊं, शून्य गगन पर मैं उड़ जाऊं।
शांत रैन की गोद विराजूं,नयन मूंद जग दर्श करूं,
टिम टिम तारों के संग बैठूं, मौन वार्तालाप करूं।
कोई तूलिका न रंग लाऊं, वर्ण वर्ण के चित्र रचूं,
बिना लेखनी के लिख जाऊं, अर्जित अनुभव सार लिखूं।
विटप वल्लर मैं बन जाऊं, मधुर वायु संग झोंके लूं,
पर्ण कली मैं यारी कर लूं, तुहिन कणों से सिक्त रहूं।
उषा के आंगन में खेलूं, स्वर्ण कांति में राग भरूं,
प्रकृति मां तेरा कर पकडूं, निरुद्देश्य मैं रमण करूं।
जीवन कला पाठ नित पाऊं, सदा तेरे आलय में रहूं।।।
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ऋतु बाजपेई 🙏


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