भाव जगत की अवलोकन में,
सुन्दर छवि की मेरी गुड़िया।
सूक्ष्म पद चिन्ह निश्छलता की,
जैसे सुमन की पंखुड़ियां।
तरवर शाखा की कोमल फुनगी,
सादर चित्तवन से सत्कार करें।
भाव भंगिमा में चंचलता,
हृदय आलंबन से पुचकार करे।
मुख की वाणी की मृदुलता,
खिले कंज सी वक्र रव में बोले।
मटक मटक के इठलाती सी,
डगमग के उच्छल पग से डोले।
अनुपम छटा से लुब्धाती,
बिटिया अपनी अलबेला को।
मनोहरण हो जाती दृश्य देख ,
गुड़िया की नटखट लीला को।
सतेश देव पाण्डेय

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