दर्द हृदय मेंं भरा लबालब,
छलकाऊं भी तो मैं कैसे।
अश्रु भरे नयनो से आंसू,
अगर बहाऊँ तो कैसे।

अंग-अंग में आह तुम्हारी!
रोम-रोम में चाह तुम्हारी।

तुम्हें याद जो ना रखूं मैं !
अगर भुलाउं तो भी कैसे।

अधरों की वाणी अनुबंधित,
शब्दों की रचना प्रतिबंधित।
किसे सुनाऊँ मन की पीड़ा।
अगर छुपाऊँ तो भी कैसे।

कितना सहूँ पीर तन मन की!
कितना रोकूँ अश्रु नयन के!
धीरज अगर बिखरता है तो,
संयम को समझाऊं  तो भी कैसे।

स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय
    गोरखपुर