मैं पंछी अलबेला, उडने नील गगन में निकला
मेहनत को मैं ईश्वर मानु,कर्म को ही भाग्य में जानु
आसमान में मै हूँ उडता,शाम सवेरे घर को आता
तिनका-तिनका जोड़ जोडकर नीड भी मैं स्वयं बनाता
बादल की मुंडेर पे बेठा,बरखा में भीग जाता
सुबह की पहली किरणें जब धरा को छूती है 
किरणों से पहले में नील गगन में उडता हूँ 
ना बेर किसी से ,ईर्ष्या नही मै करता हूँ 
जितना दाना पानी लिखा भाग्य में उतना ही मैं खाता हूँ 
कृष्णा की✍️ कलम से