मन बोझिल तन बोझल देश मे छायी उदासी है 
घर मे दीप जलाने वालो
जनता अन्न की प्यासी है 
कितनो के सामान बिके
कितने रहन जाके पड़े
बच्चे मांगे मिठाई जलेबी 
सब्जी तेल बिन प्यासी है
देश की जनता तरस रही है
कोरोना जिसमे वासी है
डर के मारे करे न धंधा
काम काज सब हो गया अंधा
चले चवन्नी चोरों की अब 
लगे लूटने अब सब
कैसे आये मन मे खुशी
नन्हे बच्चो की गई हंसी 
मेडम  ना मक्का ना ज्वार कैसे मनाए हम त्यौहार
 देख मासूमो की दशा 
  दीपावली की क्या आशा
जला अगरबती कर पूजा
अन्नदान से धर्म ना दूजा
एक दीपक कम जलेगा 
एक समय का भोजन बनेगा
सच्ची दीपावली तभी मनेगी
नन्हों की दुनिया चमकेगी


      संध्या पंवार