बचपन तेरी कहानी का नहीं है कोई मोल
यादो का तू कोना है दिल का बस सलोना है
तेरी हमदर्दी का मैं कायल सत्य यही बस होना है
तुझ तक अब जाऊं कैसे तुमको मैं पाऊं कैसे
हैं तो सब कुछ फिर भी तुम बिन जीवन सुना है
वो नटखट वो शैतानी पन उछल कूद और दिवानापन
मौजों की रवानी थी ऐसी जीवन बचकानी था जैसे
याद बहुत तुम आते हों तन्हा तन्हा रुलाते हों
जिए तुम बिन कैसे मैं क्यो न कुछ बताते हों
बचपन फिर क्यों न तुम पुनः लौट के आते हो
पूनम लोहार

0 टिप्पणियाँ