दुल्हन बन कर आई थी ,दुल्हन बनाकर ही विदा करना।
इतनी सी अभिलाषा पिया! मेरी अवश्य तुम पूरी करना।

आई थी जब तेरे द्वारे , मैं  सोलह श्रृंगार से सजी थी।
उतना ही श्रृंगार मेरा करना, जब तुम मुझे विदा करना।

रहते थे तुम कितने  मुदित , निहारते थे अनुराग से।
उसी प्रेम  अनुराग से , प्रिय !  मुझे   विदा करना।

तेरे घर आई थी तो ,माँ बाबा के याद में रोती थी।
मेर अनंत यात्रा पर प्रिय! तुम  तनिक  न रोना।

जब कभी याद आये, मेरी   कमियां याद करना।
जीना  होगा आसान,  प्रिय! मुझको बिसरा देना।

मैं ही  बोलती  थी बहुत ,तुम  एकदम  चुप रहते  थे।
मैं  एकदम चुप हो जाऊंगी ,तो तुम विस्मित न होना।

मेरी  सखियों  के आने से , उल्लसित तुम होते थे।
अपन  हित मित्रों के साथ ,मुझे  विदा कर आना।

कितन बेचैन हो जाते थे, एक घड़ी न पाकर घर में,
पाओगे अपने पास ,दिल के  टुकड़ों  को सहेजना।

नोक -झोंक दोनोँ  में  , क़भी कभी हो जाती  थी।
कर  देना  मुझे क्षमा ,जब  चिर विदा  करना।

स्नेहलता पाण्डेय
नई दिल्ली