ये जीवन है,जीने पर सबकी आज़ादी है
जैसे भूख में है भोजन जरूरी
प्यास तो पीने से हो पूरी
धरा का आधार स्त्री जीवन की धुरी
नन्ही मुट्ठी में बंद सपने लेकर आती है
दिखा जो उजाला तो हाथ बढ़ाती है
ग़र रौंदा जो हौंसले को पैरों तले इसके
सपनो की मुट्ठी वो कभी न खुल पाती है
इसकी उसकी हर ख़्वाहिश ओर
ज़रूरत सँवारते- सँवारते
उसकी तो ख़्वाहिश ही मर-मर जाती है
घर की लाज़ तो उसके ही हाथों है
ये न कर ,वो भी न कर
सौ सौ न जाने कितनी बातें हैं
जिसकी मैली निगाहें तुझपर थी अटकी
वो न था अपराधी तू ही थी कहीं भटकी
क्या पहना क्या श्रृंगार तेरा था
तेरा ही दोष था उसमें
बस दोष ही था तेरा
क्यों गई तू अकेली सूनसान रातों में
क्यों तेरे मुख पर अल्हड़ लाली रही
हो तेरी मुस्कान में आमंत्रण की भेंट कहीं
तेरा ही होता आया है हमेशा चरित्र सही नहीं
कदाचित तूने ही आँचल सही न ओढ़ा था
दोषी का बस फिसला था मन
गलत समय के उसकी चाल थी
वो तोबस नाबालिक छोरा था
न ध्यान दिया न तुझ पर
न घरवालों का पहरा था
गलतफहमी रही होगी
नारी जागरण का बस घना कोहरा था
पूछती हूं सबसे,हां तुमसे भी!!!
ऐसी दलीलों में फंसी
वो अक़्सर क्यों मारी जाती है
वोमन एम्पोवेर्मेंट व महिला संरक्षण की
कुछ काग़ज़ी दलीलों में सरे आम
धज्जियाँ उड़ जाती हैं
वो हाँ वो ही आबादी जो पूरी आबादी है
लेकिन .....!!
ऐसा भी नहीं सम्मान कहीं नहीं है
हर पुरुष नारी के प्रति हैवान नहीं है
मैत्रैयी से मेरी कौम तक
हिंदुस्तान इटली या रोम तक
स्त्री को पुरुष का साथ भी आभारी है
किन्तु ये विचार हर बालक से नर तक
निहित गहन होना चाहियें
घर घर में स्त्री सम्मान होना चाहियें
जिस घर में परम्परा ये परवान चढ़े
उस घर के सपूत क्यों फिर हैवान बने!
हर स्त्री उस पुरुष के लिये पुजारि है
जिनके अजन्में जीवन की गांठ नारी है
ईश्वर के दैवत्व की भी दैवी ही प्रभारी है
माटी ये वो है जहाँ पुरूष विधाता
दैवी की प्रतिमा हर नारी है
हर स्त्री की सुरक्षा सम्मान की
सच्चे पुरुष की आवश्यक ज़िम्मेवारी है
"अबला नहीं वो सबल वीरों सी
दोनों पूरक जैसे
पूर्ण पुरुष में आधी नारी हैं।।
-
भारती प्रवीण..✍️💕

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