भव जननी करुणा की सागर, पावन निर्मल हृदय तन।
उद्वेलित ममता की धारा, निश्छल है सदया का मन।

पहन वसन लज्जा की, छिपाती फिरती अपने आनन।
मर्यादा पुरुषोत्तम की नगरी, मानो अब हो जैसे कानन।

दहन अभिलाषाओं की करती, सर्वत्र स्थल में है दुर्जन।
दुर्लभ सा गंतव्य है इनके, नारीत्व की करती ये अर्जन।

अपने आदर संचय को, निनाद स्वरों मे करती गर्जन।
जननी हो या बाला, अपने प्राणों की करती है वर्जन।

रूद्र भी नतमस्तक होते, देख चंडी रूप विकराल की।
जग थर थर थर कांप रहा, हथियार लिए कृपाल की।

प्रवाल नहीं तलवार बनो, सुन गाथा मर्दानी झांसी की।
प्रहार करो संहार करो, चाह नहीं नितिन के फासी की।


सतेश देव पाण्डेय