पेन्टिंग और कविता दोनों ।
मेरे चित्त के उद्दगार।
कलम या ब्रश सिर्फ़ ।
हाथों की कठपुतली
चित्र तो उद्गीत होकर ।
मस्तिष्क से निकलता है।
दोनों देते मन का सकुन।
एक महसूस करता है।
दुजा चित्र बन सामने आ जाता है।
जैसे एक कविता को ।
उजागर कर दिया कैनवास पर।
या एक आँखो से महसूस होकर ।
कविता में ढल जाता है।
स्याही बन कविता रच जाती है।
वही बिखरे रंगों से।
एक दर्शय सामने उभरता है।
नीलम गुप्ता 🌹🌹(नजरिया)🌹🌹
दिल्ली

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