"तुम्हें ढूंढती ही रही हाथों की लकीरों में
तुम तो लिखे ही नहीं थे मेरे तकदीरों में।।
तुम्हें लिखती रही मैं कागज़ के पन्नों पर,
तुम फिसल ही गए जिंदगी के रास्तों पर।।
तुम्हें छुपाती रही मैं दुनिया के नजरों से
तुम तो मेरे ही नहीं हुए पूरे समर्पण से।।
तुम्हें बचाती रही मैं जिंदगी के थपेड़ो से।
तुम निकल ही गए मेरे हाथों की लकीरों से।।
मैं लड़ती रही हमेशा रास्तों के मुश्किलों से।
मैं समझ ही ना सकी अपनों के साज़िशों को।।
मैं उलझती ही गई जीवन के संघर्षों में,
तुम सुलझा ही नहीं पाए बिखरते रिश्तों को।।"
अम्बिका झा ✍️

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