मन मंदिर में
बन कर कोई धून
मैं तुम्हें बारंबार गुनगुनाऊं
तुम्हारी स्वर में मैं
खोना चाहूं
पूरे भवसागर से पार
सिर्फ अंतर्मन के साथ
मैं बस तुम्हारे निहारुं
हृदय बन जाए कोई
शब्द कोश
पुष्प रुपी वर्ण की
हो रही वृष्टि मुझ
पर घनघोर
बन जाऊं मैं
कोई संगीत
बस जाओ कंठ में
हे वीणा वादिनि
कुछ क्षण के लिए मैं
भी होना चाह रही हूं
सबसे उन्मुक्त
अपने अंतर्मन में
मैं आज जीना चाहूं
संगीत लय में
मैं संपूर्ण जीना चाहूं
प्रिया ✍️
संगीत की झंकार
आत्मा से आत्मा तक

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