मिट्टी थी पत्थर की पहारें
जब किसी ने हमें,'डोभा' था
नमीं न कहीं अरचन थी 'सुखारी'
फिर हिम्मत से जीना था
बारिश की एक बूँद थी काफीं
उगने के लिए ही,हमको बोया था
सामना करने की आदत जो,
अंकुरियों में ही सिखा था
बिजली की चमकने की आहट सी आयीं
बादल को धूम मचाना था
गिरती गई 'अमृत' सी बूँदें
तब तो पंख फैलाना था
अब आज़ादी थी जींवन की
बाहर निकलना तब हमने ठान लिया
अंदर से जागी तब,जीने की ताकत
'कली' जग में हमनें बिछोड़ दिया
लेखक:-विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

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