छिड़कटी तरूणी नटी नवल सी,
चक्षु छोर कजरारे।
घनी केश अवनत कटी,
सृजित सुमन की गजरे।
मांग टीका की नथिया वेंदी,
कर्ण कुंडल की लटकन।
कुमकुम बिंदी मलय की लेपन,
निखर गई है आनन।
मादकता की श्रोत बहे,
मुखड़े की एक झलक से।
शावक मूर्छित होते,
देखे कटाक्ष दृग की पलक से।
निलय रमणी के डगर,
वृद्ध तरुण की लगती फेरी।
बंद झरोखे है फिर भी,
तारक दरीचा पट के ओरी।
सतेश देव पाण्डेय

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