अक्सर बैठा करती थी वो खिड़की के उस पार,
कोई भी देखता तो हो जाता उससे प्यार।
नीली नीली आँखे, नागिन सी लहराती जुल्फें,
थी अदभुत सौंदर्य की मूरत साकार।
पर दुनिया से अनजान थी किताबों से थी दोस्ती,
नही था उसे किसी भी बात से सरोकार।
एक दिन एक सुन्दर सा आया राजकुमार,
व्याह कर ले गया उसे अपने द्वार।
वो कितना घबराई थी , कितना अश्क बहायी थी,
पहली बार की थी उसने बाबुल की दहलीज पार।
नयी नयी जगह थी ,मन में कशमकश थी,
पर कुछ था जाना पहचाना यहाँ भी थी खिड़की द्वार।
पर वो यहाँ बैठ नही पाती  लेके हाथों में किताब,
क्योंकि यह मायका नही था उसका ससुराल।
सब उससे खुश थे, वो भी चाहते बहुत थे,
फिर भी  मायके की वो खिड़की उसे बुलाती बार बार।
सब कुछ उसके पास था न दर्द का एहसास था,
वो ही लकड़ी की खिड़की थी पर जगह बदली थी बदले थे  विचार।
बहुत बड़ा अन्तर है मायके और ससुराल ,
बहुत सोच समझकर करना होता है व्हवहार।

              अंजू दीक्षित,
           बदायूँ, उत्तर प्रदेश।