क्यों ??
क्यों?? इस धरा को बांट दिया जाति मे,
क्यों???सरिता के प्रवाह को रोक दिया घाटी में ,
अनुपम कृति है मानव होना,
अमिट धरा की छाप होना,
फिर भेदभाव क्यों जाति का ,
नि स्वार्थ प्रेम क्यों नहीं साथी का !!
पहचानो उन रश्मों को,
याद करो उन जख्मों को ,
बलिदान दे गए जो परिवारों का ,
मन में उनके आया था क्या
भेदभाव जाति का !!!
त्याग दिए सुख सारे अपने,
भूल गए वो सारे सपने,
भिन्न भिन्न जाति के वो
ये भाव जगा नहीं तनिक भी उनमें!!!
चंद पैसों की खातिर,
बांट रहे तुम्हें जाति मे,
पहचानो उन गिरगिट को तुम
मार रहे तुम्हें छाती में!!!!!
इस जीवन की धार बनो तुम,
पुण्य धरा का नाम करो तुम ,
जाति पाती का भेद भुला कर
देश का अभिमान बनो तुम ,
जय हिन्द की शान बनो तुम !!!!!!
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (म प्र.)

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