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आँगन न होय फ़कीर के
घर-घर मिलन समाज.....!
विद्या-वाणी जो कहे
समझे भिक्षुक आय.....!!


सुंदर वाणी,ताल है
सुंदर सजल गण सूर.....!
गाये साधु जोगन,को
होय मधूर जग धूल.....!!


नभ में तारे-जोत है
सिमटे सारा,प्रकाश.....!
निकले किरण अब लाली में
जग सुंदर हो जाय.....!!


साधु सरस की मीत है 
महँके हरित,गुलज़ार.....!
रचित कविता शब्द में 
मन हर्षित हो जाय.....!!


इज्ज़त करता नेक है 
वंदन करत,नवात.....!
आर्शिवाद हो साईं की 
घर-घर मिलत असार.....!!


 
     लेखक:-विकास कुमार लाभ
                  मधुबनी (बिहार)