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ये प्रकृति कितना देती हैं।
नव सृजन नव धरोहर।।
किरणो से भर देती है।
ये प्रकृति कितना देती है।।
ये जीवन की स्वरलहरिया।
खुद का ही श्रँगार करके।।
तरु लता को जीवन देकर।
मरु को अगीँकार करके।।
वैधव्य सह लेती है।
ये प्रकृति कितना देती हैं।।
जनमानस के पटल छवि पर।
हो मुखरित छन्द बनकर।।
तन्मयता से जीवन देकर।
पोषण से परिपूर्ण कर।
संस्कार भर देती है।
ये प्रकृति कितना देती हैं।।
रीमा महेन्द्र ठाकुर 🙏🏼

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