आज भी कैद हूँ .....
तेरी यादों के साए में!
कितने सुकून भरे थे वो पल।
जब कॉलेज के लाइब्रेरी के सामने,
पार्क में ,हरे रंग की,मखमली घास की ,
कालीन पर बैठकर, धूप सेंकते हुए ,
एक दूसरे के हालातों पर चर्चा करते। 
मैंने कह तो दिया एक दूसरे के हालात.....
लेकिन चर्चा,केवल मेरे हालातों की ही होती।
रोजमर्रा की उलझनें,...और भी तमाम बातें,
जो मुझे व्यथित करतीं।
कितना मुश्किल होता है!
एक गरीब किसान के बेटे के लिए,
उच्च शिक्षा प्राप्त करने.........
के खर्चे को वहन कर पाना।
तुम्हारे कुछ सुझाव........ ,
और नसीहतें भी होती थीं।
मैं अपनी रोजमर्रा की जिंदगी....
का ब्यौरा, तुम्हें सुनाता।
तुम मुझे बहुत ध्यान से सुनती .......
बीच-बीच में कुछ राय भी देती......
मैं केवल अपनी ही कहता ,
तुम्हें कुछ कहने का मौका ही कहां मिला।
कि मैं तुम्हें सुन पाता .....तुम्हें जान पाता ।
तुम्हारी जिंदगी के  पन्नों को पढ़ पाता।
मैं अपनी उलझनों में खोया रह गया,
एक दिन तुमने मेरे हाथ में एक कार्ड थमा दिया।
मुझे मज़मून समझ आ रहा था।
ये मेरे लिए  कयामत से कम न था।
लेकिन बाद मेंं लगा  ठीक ही है.......
एक किसान का बेटा ! 
जीवन की विषमताओं से जूझते हुए ..........
तुम्हारे सपनों को क्या कभी पूरा भी कर पाएगा।
मै तुम्हारे नए जीवन की शुभकामनाएं दे रहा था।
तुम निर्लिप्त भाव से खड़ी थी।
तुम्हारे आंखों को देख कर,
मैं  नहीं समझ पाया.....तुम खुश हो या नहीं ।
कुछ तो  खटक रहा था।
सोच  रहा था ..........
काश! मैंने  तुम्हें भी सुना होता ......
तुम्हें भी कुछ कहने का मौका मिला होता।
मैं अपनी रोजमर्रा की दास्तान,
तुम्हें सुनाता रहा पर........
दिलों की दास्ताँ अनसुनी रह गई।
तेरे साथ रोज चलता रहा ....... 
लेकिन आक़िबत मेंं,
साथ चलने की चाह अधूरी रह गई।
आज भी सोचता हूं .......
काश ! तुम्हें भी कुछ कहने का,
मौका दिया होता ......
.......मौका मिला होता.....।
                                     मज़मून--विषय
                            
आक़िबत --भविष्य 

स्नेहलता पाण्डेय
     नई दिल्ली