"कर्तव्य पथ पर क़दम बढ़ा
अभिमान की चिता जला दी।।
दफ़न कर अरमान दिल के,
खुशियों के चमन खिला दिए।
करने चली त्याग-समर्पण
इच्छा की बलि चढ़ा दी।।
पहन कर कर्म का कंगन सुनहरी,
जिम्मेदारी की मेहंदी रचा ली।।
ओढ़ कर स्वाभिमान का चूनर,
संघर्ष पथ पर क़दम बढ़ाए।
बन गयी एक संपूर्ण नारी,
अपनी ही पहचान मिटा दी।।
बन कर मिशाल जगत् को
सच्चाई का पाठ पढ़ा,
टूटकर अपनी टुकड़ों से
औरों की महल बनाया।।
जोड़ कर प्रेम धागों में,
परिवार को समृद्ध बना।
खुद का अस्तित्व मिटा दिया,
जला कर अंदर के तिमिर को,
प्रेम की बौछार कर दी।।
मैं ही,वह नारी, देवी शक्ति,
हाथ जोड़ते जिस देवी को,
धरे रूप मां, बहन, और भार्या
खुद का अस्तित्व मिटा दी।।
जल कर ही कर सकते हैं रोशन,
अंधेरों को अपनी कीमत बता दी।।"
अम्बिका झा 👏

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