नोट :- कुछ समय बाद बच्चों की बोर्ड परीक्षा आने वाली है उसके लिए खास कहनी।

बच्चे तो रब का अनमोल तोहफा है । सूनी जिंदगी की बहार है ।

" मुबारक हो ! आपको बेटा हुआ है " नर्स ने बेटा हारून की गोद में पकड़ाते हुए इनाम मांगा । सास अदीला ने फौरन खुशी के मारे अपना पर्स खोलकर पांच सौ का नोट निकाला और नर्स को थमा कर बहू फातिमा की तरफ देखा तो वह रोए जा रही थी । 
" यह तो खुशी का मौक़ा है । डिलीवरी में तो तुमने इतनी हिम्मत दिखाई ज़रा भी चीख़ीं चिल्लाई नहीं , ना ही रोईं । अब क्या हुआ..?"  प्यार से उसका सिर सहलाया।

" मुझे लड़का कैसे हो गया अम्मी जान !! नहीं नहीं मैं तो पांच बहन हूं मेरा कोई भाई नहीं ...!! मेरे पापा बेटे की ख्वाहिश लेकर दुनिया से चले गए । मैं बहुत खुश हूं , मैं बहुत खुश हूं । यह खुशी के आंसू हैं , खुशी के आंसू हैं ।"

यह वह दिन था जब अली , हारून और फातिमा की जिंदगी में खुशियों का रंग बिखेरने आया । हल्के घुंघराले बाल , गेहूंआ सा रंग , बड़ी बड़ी आंखों वाला अली पहली औलाद था तो ननिहाल , ददिहाल सब जगह से उसे प्यार मिलता । 

अली अभी सात महीने का था कि उसको पहले जाड़े में सर्दी लग गई और 1 महीने तक चली खांसी ने बढ़कर बच्चों में होने वाली चाइल्ड ब्रोंकाइटिस का रूप धर लिया ।
बेचारा अली खांस खांस कर निढाल हो जाता बुखार की कमज़ोरी से कुछ खा नहीं खा पाता । नाक अंदर से सूज जाती जिससे लेटने पर सांस ना आ पाती तो सो ना पाता, बार-बार उठ जाता । रोने लगता , सब उठ जाते , टहलाते घुमाते , लोरी गाकर सुनाते ।
खूब दवा इलाज हुआ तो धीरे-धीरे 3 साल होने पर उसकी कमजोरी , बीमारी कुछ हद तक ठीक हुई तब वह थोड़ा-थोड़ा हंसने बोलने लगा , खेलना दौड़ना शुरू किया ।

इससे पहले 6 महीने की आयु में बच्चे जब इधर-उधर भागते हैं हर चीज पकड़ने दौड़ते हैं उस समय फातिमा  किचन प्लेटफार्म पर कोने में उसे बिठाकर रोटियां पकाती थी,  ऐसा किसी को करना तो नहीं चाहिए मगर फिर भी बच्चे ने कभी हिल कर तवा या  चाक़ू कोई भी चीज़ छुई नहीं । बस चुपचाप बैठ कर अपनी मां को देखता , उसकी बातें सुनता , मुस्कुराता रहता ।

बच्चे की सादगी देखकर घर के पड़ोस में रहने वाली बच्चियां अक्सर कहती , " कितनी सीधे हो तुम अली ? कभी तो शैतानी किया करो ।" 
9 महीने की उम्र में जल्दी ही अली नें चलना शुरू किया लेकिन कभी भी इतना नहीं दौड़ा कि किसी को भाग कर पकड़ना पड़े। शाम को जिस कुर्सी पर उसकी मम्मी और दादी बैठी रहती वहीं पर वह चक्कर लगाता कहीं दूर भागता नहीं । बिल्कुल मासूम सा । कभी किसी चीज़ की उसने ज़िद नहीं की ।

एक दिन किसी के घर दावत में जाने से पहले फातिमा ने अली को समझाया , '" बेटा वहां शैतानी नहीं करना "  तो बच्चा पूछता है  ,  " और  मम्मी बद्तमीज़ी ??"
"  हां वह भी नहीं करना " फातिमा बच्चे के भोलेपन पर हंसने लगी ।

रोज़ रात को सोते वक्त फातिमा उसे छोटी-छोटी दुआएं सिखाती और वह झट याद भी कर लेता ,  उसकी याद्दाश्त बहुत ही अच्छी थी ।

अब स्कूल में नाम लिखवाया गया तो फातिमा उसे दिनों के नाम और नंबर और मैथ के टेबल याद कराने लगी। वह सब उसे याद कराती है और वह याद कर लेता । 
अली की राइटिंग इतनी सुंदर और साफ थी कि हर पेज पर टीचर उसे गुड और स्टार देती ।

सुबह  जब फातिमा स्कूल जाने के लिए उठाती तो वह एक आवाज़ में उठकर प्यार से तैयार हो जाता । वैन के आने से 10 मिनट पहले ही अपनी छोटी चेयर पर बैठ कर इंतजार करता ।  अली स्कूल में भी टीचर का चाहीता बन गया । पहले रिजल्ट कार्ड पर टीचर ने रिमार्क लिखा, 

"  कुछ बच्चे को कुदरती तौर पर आउटस्टैंडिंग होते हैं वैसा ही है अली " 

ख़ुद एम ए पास , पढ़ाई लिखाई के महत्व को समझने वाली फातिमा अपने बच्चे की इस प्रतिभा को देखकर एक ओर तो खुश हुई दूसरे उसके मन में एक कोने पर कहीं अधिक नंबर पाने की लालच ने जन्म ले लिया । 

अपने तौर पर उसे यह लगता था कि वह बच्चे को दिल लगाकर पढ़ने की हिदायत दे रही है  । ऐसा नहीं था कि वह सिर्फ अली को पढ़ाई की ओर प्रेरित ही करती बल्कि वह खुद भी उसके साथ लगातार लगी रहती ।
फातिमा का परिवार अपने नाते रिश्तेदारों से दूर दूसरे राज्य में रहता था,  कोई आने जाने वाला नहीं होता और दो लोगों का खाना होता ही कितना है उसको बनाकर । कभी कभार संडे की आउटिंग को छोड़कर फातिमा युद्ध स्तर पर अली की पढ़ाई में ही व्यस्त रहने लगी ----

फातिमा कभी पाठ को पढ़ा रही होती , कभी समझा रही होती , कभी स्कूल का टेस्ट होता तो उससे पहले ही ख़ुद पाठ का चार बार टेस्ट ले लेती।  एक भी शब्द लिखने में एक भी अक्षर की त्रुटि होने पर उसे 5 बार 10 बार लिखवाती ।  बच्चा इतना सीधा और प्यारा था कि मां का सब कहना मान लेता फिर उसके परीक्षा में नंबर भी अच्छे आ जाते तो वह भी दुगने उत्साह से आगे की मेहनत करता ।

लेकिन धीरे-धीरे अनजाने में कुछ बदल रहा था । कहीं कोई क्रोध अंतर्मन में पल रहा था ।

हर  समय की पढ़ाई से खीझ उत्पन्न हुई या फिर समय के बदलाव में टीवी मोबाइल लैपटॉप के आगमन से लालच ने बच्चे को अपनी तरफ खींचा । इसका हल भी फातिमा ने निकाल लिया । वह अपनी तरफ से अच्छा ही करने लगी कि बच्चे की लालच को पूरा करके उसे शांत करने की कोशिश करती  । उसे मोबाइल लैपटॉप चलाने की अनुमति दी परंतु नियत समय पर रोज़ के 2 घंटे । 

इस तरह अली के जीवन में इंजॉय के पल जुड़ गए । मगर अब  यह सब चलाने के बाद जब फातिमा उसे पढ़ाई की तरफ बुलाती तो अली का प्रतिरोध पाती । बच्चे के मन में खेलकूद का लालच भी पढ़ाई से रोकने लगा  । अली का क्रोध और फातिमा का क्रोध आमने सामने आ चुका था इस समय कक्षा  थी नवीं। 
उम्र में बदलाव आया , किशोरावस्था बच्चों के लिए बहुत बड़े बदलाव की अवस्था होती है। एक तरफ शारीरिक विकास और साथ में ही दुनिया को अपने नज़रिए से देखने की समझ पैदा होने लगती है। मन में बहुत सारे विचारों का जमावड़ा लगा रहता है। नई उमंगों और उत्साह के साथ विद्रोह का स्वर अपनी बात सिद्ध करने की ज़िद पैदा होती है।

इन दिनों दोनों रोज-ब-रोज बहस झगड़ा तकरार होने लगी ।कभी फातिमा रो के बच्चे को इमोशनल करके पढ़ाई करवाने की सीख देती कभी प्यार से समझाती‌ वो समझता भी वादा भी करता मगर परीक्षा में भी इस बार नंबर बहुत काम आए तो पैरंट टीचर मीटिंग में टीचर से बात की गई ।
उन्होंने भी शिकायत की कि, 
"  अली की परफॉर्मेंस खराब हो रही है शायद इसका कारण बड़ी क्लास है कभी-कभी कुछ बच्चे छोटी क्लास में तो अच्छा प्रदर्शन करते हैं मगर जैसे-जैसे क्लास बढ़ती है तब कुछ ही बच्चे आगे अच्छे से बढ़ पाते हैं , अन्य सामान्य ही रह जाते हैं सबका अलग अलग क्षेत्र होता है सभी पढ़ाई में ही एक जैसे टॉपर नहीं होते।

इस बात को फातिमा के लिए हज़म करना जरा मुश्किल हुआ उसे लग रहा था कि जब दूसरे बच्चे पढ़ाई कर पा रहे हैं तो मैं किसी ना किसी तरह मेहनत करके अपने बच्चे को अधिक नंबर ले ही आऊं ‌। 

अब तकरार रोज़ की बात हो गई, गुस्सा में बात मार पिटाई पर आ गई। इतने बड़े बच्चे को अक्सर फातिमा मार देती और गुस्सा होकर उसकी कॉपी किताब भी फेंक देती । हल तब भी शून्य ।
फिर हार मान के दोबारा पढ़ाई करवाने बैठ जाती । बड़ी क्लास की पढ़ाई उसे ख़ुद भी कम समझ आती इस कारण सही पढ़ा भी नहीं पाती तो नंबर आते भी कहां से...

समय गुज़रने के साथ फातिमा को पता ही नहीं चला कि कब उसे ब्लड प्रेशर की बीमारी हो गई और कब एक सगी चाहने वाली मां अपने बच्चे की दुश्मन हो गई । 

आज के दिन दसवीं कक्षा के बोर्ड के एग्जाम में 4 महीने बचे थे और फातिमा के लगातार बढ़ते प्रेशर और जोर-जोर से चिल्लाने पर अली ने अपनी किताब उठाकर फेंक दी और बोला , 
" मम्मी  अगर आपने मुझे मारा मैं अब आपको भी मारूंगा "

यह शब्द फातिमा के ऊपर जहर की तरह गिरे उसे लगा कोई तेज़ाब उसके चेहरे पर डाल दिया गया है कि अपना बच्चा उसे ऐसी बात कह रहा है सिर्फ यक़ीन नहीं हुआ।

अली किताबें फेंक कर छत पर चला गया और बहुत देर तक बैठा रहा । फातिमा की भी हिम्मत नहीं हुई कि वह उसे बुला कर लाती थोड़ी देर के बाद उसे डर लगने लगा कि कहीं अली कोई ग़लत कदम ना उठा ले । 

बार बार  छोटी बहन मां से बोलती , 
" मम्मी भाई कहीं सुसाइड तो नहीं कर लेगा जैसे और बच्चे करते हैं। आप भाई को बहुत पढ़ाने पर ज़ोर देती हो । इतना नहीं पढ़ाया जाता । छोटी बच्ची की बात सुनकर फातिमा को काटो खून नहीं , छोटी बच्ची समझ गई , उसकी आंखों पर नम्बर की पट्टी चढ़ गई। अब उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था ।

बहरहाल थोड़ी देर के बाद अली छत से नीचे आ गया और रात में फातिमा ने रो-रोकर हारून से अपनी समस्या का समाधान मांगा तो हारून ने उसे समझाया ,

" यह तुम्हारी ग़लती है तुम दिनभर चिल्लाती हो और दिन भर बच्चे से पढ़ाई के लिए ज़िद करती हो । तुमने उससे प्यार से बातें करना छोड़ दिया है । 

तुम्हारे पापा को बेटे की ख्वाहिश थी और उन्हें बेटा नहीं मिला कुदरत ने तुम्हें एक प्यारा सा बच्चा दिया और तुमने उसे अपनी आकांक्षा की भेंट  चढ़ा दिया । मैंने हमेशा तुमको टोका । अच्छा हुआ कि तुम समय रहते चेत गईं । 
उस पर पढ़ाई का इतना बोझ मत डालो वह भी तुमसे प्यार करता है और समझता है कम नंबर भी आ जाए तो कोई बात नहीं पर तुम्हें बेटा चाहिए या फिर नंबर......???

उसे थोड़ा समय दो वह खुद ही सीख जाएगा यदि उसे सीखना होगा वरना तुम किसी भी हथियार से कुछ नहीं कर पाओगी।" 


फातिमा ने फौरेन नमाज़ पढ़ी और रो रो के अल्लाह से अपनी गलतियों की माफी मांगी ,
" एय अल्लाह आपके दिए तोहफे को मैं बर्बाद कर रही थी मुझे माफ कर दीजिए । मुझे सीधा रास्ता दिखाइए और मेरे बेटे पर अपनी रहमत नाज़िल फरमाइए।  मेरे बेटे की जिंदगी में खुशियां आएं " 

दूसरे दिन की सुबह बहुत सुहानी थी फातिमा ने सोचा आज  अली को पढ़ने के बारे में कुछ नहीं कहेगी पर उसने देखा वो ख़ुद ही कॉपी किताब लेकर पढ़ने बैठ गया । वह भी बहुत शर्मिंदा था उसने आकर मम्मी से सॉरी बोली और वादा किया कि ,
"  मैं पढ़ाई की तरफ ध्यान दूंगा । मैं भी आपसे बहुत प्यार करता हूं रोते-रोते उसकी आंख से भी आंसू गिरने लगे।मुझे माफ कर दीजिए मम्मी  मैं आपका वही अच्छा और प्यारा बच्चा हूं और वही बन कर रहूंगा।" 

चार महीने के बाद फाइनल रिज़ल्ट आया अली के  91% मार्क्स आए । अली कुछ उदास हुआ, 
" मम्मी आप ने अपने मुझे डांटा मारा नहीं , अगर आप थोड़ा डांट देती तो मेरे नंबर बढ़ जाते " 
हारुन तो हंसने लगे और फातिमा ने गले लगा कर अली को प्यार किया, 
" बेटा तुम्हारे नंबर सच में अच्छे ही हैं। मैं बहुत ख़ुश हूं । वो दिन याद कर करके मेरा दिल दहल जाता है ,समय रहते मैं जाग ना जाती तो होने वाले नुक़सान की भरपाई ता ज़िंदगी नामुमकिन रहती।" 
------------समाप्त


मेरा आप सभी से हाथ जोड़कर निवेदन है कि प्लीज कोई फातिमा ना बने, बच्चा आपका अपना है।आप उससे बहुत प्यार करतीं हैं ।


            राबिया शमीम