गले में पड़े लाकेट को निहारते हुए
खो जाता हूँ  यादों के सागर में तेरी
आ जाती है मुस्कान अधरों पर
वो तेरी- मेरी पहली मुलाकात
तैर जाती है  आंखों के सामने मेरी

तेरा यूँ सबसे उलझना
रैगिग लेने वालों को
मारना वो थप्पड़ यूँ कि
महसूस किया सबने
अपने-अपने गालों पर
मुँह से निकला सिर्फ  सॉरी
और उठ गये हाथ सबके
अपने-अपने कानों पर

भूल न पाया वो भी कभी
गूँज उस थप्पड़ की
वो आवाज आज भी 
गूँजती है जब कानों में
रख लेता हूँ हाथ अपने कानों पर

वक्त भी बड़ा रहम दिल
ले आया पास दो दिलों को
सजे ख्वाब मदभरी आंखों में
दो जिस्म एक जान बन गए वो
हुयी कृपा असीम ऊपर वाले की
परिवार का भी साथ मिल गया
बंध गये थे जो दिलों से
पाणिग्रहण से भी जुड़ गए

दिया उपहार प्रिया ने
लाकेट गले में डाल दिया
मैं पहनूँ मंगलसूत्र
तुम लॉकेट को समझना
प्यार की ये दीवार है
न मैं लाघूँगी कभी इसे
न तुम कभी इसे तोड़ना
लॉकेट  नहीं ये बन्धन है ये
इसे प्यार से सहेजना

लेकर वादा वो निर्मोही
चाँद- तारों के बीच चली गयी
तन्हा सा- अकेला सा
बीच सफर में छोड़ गयी
आज भी याद कर उसे
लाकेट को  चूमता हूँ
उसको दिए वादे को
कभी नहीं भूलता हूँ।।


🌹आशा झा सखी🌹✍🏼✍🏼✍🏼✍🏼✍🏼