हेमा सुबह से ही जल्दी जल्दी घर के कामों को निपटाने में लगी है, खुश भी बहुत है आज। क्यूं न हो  खुश, उसका इकलौता बेटा नैतिक और बहू प्रज्ञा जो शादी के छः दिन बाद हनीमून के लिए गए थे वो आज बीस दिन बाद लौट के आ रहे हैं। 
हेमा ने अपने जीवन मे बहुत परेशानी झेली थी, उनकी सास बहुत तेज तर्राट महिला थीं, गृहकार्य में कुशल होने के बाद भी हेमा को बहुत सुनाती थी, अपना जीवन ताने सुनते ही बिताया था। इसलिये उन्होंने सोच रखा था कि अपनी बहू  के साथ वह एक सास नही माँ बनकर व्यवहार करेंगी।उसके पति हर्ष भी पत्नी की खुशी में खुश रहते हैं।
बाहर गाड़ी की आवाज सुनकर वो दौड़ी दौड़ी दरवाजे पर आई,दोनों की आरती उतारी , उन दोंनो ने भी हेमा से आशीर्वाद लिया। जब तक वो दोनों फ्रेश हुए हेमा ने नाश्ता सर्व कर दिया,वो अपनी बहू  से कोई काम नही कराती, प्रज्ञा जिद करती तो उसे प्यार से मना कर देती कि तुम मेरी बहू  नही बेटी हो। वह प्रज्ञा को कहती कि बेटा तुम कोई जॉब क्यों नही करती , तुम पढ़ीलिखी हो ।जो चाहे वो कर लो, मेरी ओर से कोई रोकटोक नही है।
वैसे तो प्रज्ञा को नौकरी में कोई रुचि नही थी पर हेमा के बार बार कहने पर उसने प्रयास किया तो उसे बैंक में जॉब मिल गई।अब हेमा दिन भर घर सम्हालती और प्रज्ञा नौकरी करती।सुबह से जल्दी के कारण और शाम को दिनभर की थकान के कारण वह कोई मदद नही करा पाती थी।धीरे धीरे उसे अपनी सास की इन सेवाओं की आदत सी  हो गई और अब तो वह काम करना चाहती ही नही थी।हर्ष कभी कभी हेमा को बोलते कि तुम तो घर के कामों में पहले से भी ज्यादा व्यस्त रहने लगी तो वह हंसकर कहती मुझे अच्छा लगता है यह सब।तो वह चुप रह जाते।
शादी के एक वर्ष बाद प्रज्ञा और नैतिक के जीवन में नए मेहमान के आने की खबर मिली तो हेमा तो प्रज्ञा को पलँग से पांव तक नीचे नही रखने देती थी। एक बार नैतिके की बुआ रहने आई थी तो हेमा को इस जरूरत से ज्यादा स्नेह के लिये समझाई भी थीं।पर हेमा को तो अपनी बहू की अच्छी सास बनना था सो उसने अपनी ननद की बात पर ध्यान नहीं दिया।
समय पूर्ण होने पर प्रज्ञा की गोदी में छोटा से ध्रुव आ गया, हेमा का तो जैसे बचपन लौट आया ।पूरे दिन लाड़ प्यार  से उसकी देख रेख में लगी रहती। 
जब नैतिक ने  प्रज्ञा से बेटे ध्रुव की देखभाल करने के लिए जॉब छोड़ने को कहा तो हेमा ने कहा कि मैं तो हूँ,क्या जरूरत है उसे जॉब छोड़ने की। प्रज्ञा ने फिर से जॉब ज्वॉइन कर लिया। 
दिन हंसी खुशी बीत रहे थे कि एक रोज हेमा को सीने में दर्द उठा,तुरन्त हॉस्पिटल ले जाया गया ,पता चला मेजर हार्टअटैक हुआ है ,उसे एडमिट करना पड़ा। सात दिन बाद जब घर लौटी तो  हेमा बहुत कमजोर हो गई थी ,अब पहले की तरह वह घर के काम करने में असमर्थ हो गई। 
पहले जो प्रज्ञा उसको माँ कहकर प्यार जताया करती थी अब उससे बात करते झुंझलाने लगी। अक्सर नैतिक से भी लड़ पड़ती । 
इस बीच नैतिक तीन दिन के ऑफिसियल टूर पर  गया था और प्रज्ञा की छुट्टी थी।दोपहर में  हेमा अपने कमरे में आराम कर रही थी ,उसे प्यास लगी। उसने आवाज दी तो किसी ने नही सुना।उसे लगा शायद प्रज्ञा  की नींद लग गई तो वह खुद ही पानी लेने किचन की ओर चल दी।जब वह प्रज्ञा के कमरे के पास से निकल रही थी तो प्रज्ञा के हंसने की आवाज आई, उसे लगा शायद कोई आया है, सोचकर वह प्रज्ञा के कमरे मे जा ही रही थी कि उसे प्रज्ञा के शब्द कानों में पड़े कि जबसे  बुढ़िया को अटैक आया है ,उसके नाटक बहुत बढ़ गए हैं । आजकल कुछ काम नही करती, नैतिक ने कहा था मुझे जॉब छोड़ने को, पर मैंने तो मना कर दिया।मैं दिन भर घर पर पड़ी नही रह सकती। यह सुनकर उसे धक्का लगा और यह  कड़वे वचन उसकी आँखों से बह निकले और उसे अपनी ननद  की बातें याद हो आई कि जरूरत से ज्यादा स्नेह अच्छा नही है।

                –प्रीति ताम्रकार
                   जबलपुर