महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में दो छोटे कुमार अपनी माता के काम में हाथ बटाते दिख जाते। बङे ही सुंदर लङके थे। जुङवां थे तो एक समान शरीर था। हाव भाव भी बहुत मिलते थे। पर सामान्य धारणा के विपरीत शक्ल में पर्याप्त अंतर था। आसनी से पहचान सकते कि कुश कौन है और लव कौन। कुछ मिनटों से बङा होने पर भी बचपन से खुद को बङा सुनता आया कुश सचमुच ज्यादा बङे की तरह सोचता। छोटे भाई का बहुत ध्यान रखता। वहीं कुछ ही मिनट छोटा लव, सचमुच शरारत का पर्याय था। माता के फटकारने पर बङा भाई भी बचाने आ जाता। इस तरह आयु में बराबर पर व्यवहार से बहुत अंतर बाले दो कुमारों से आश्रम की शोभा थी। यद्यपि आश्रम में रहने बाले तपस्वियों के लिये सारी व्यवस्थाएं निःशुल्क थीं। पर दोनों कुमारों ने माता से बार बार सुना कि वे क्षत्रिय नारी हैं। इसलिये पर्याप्त परिश्रम करतीं। आश्रम के सारे काम निपटातीं। लकङियां काटती। आश्रम के लिये भोजन तैयार करती। उस महिला में इतनी शक्ति थी कि दो चार स्त्रियों के बराबर काम खुद कर लेती। केवल महर्षि बाल्मीकि के अतिरिक्त किसी को भी पता नहीं था कि वह खुद चक्रवर्ती महाराज की रानी है। एक राजा की पुत्री और देश की रानी होकर भी देवी सीता अपना समय पूर्ण स्वाभिमान से काट रही थीं। दोनों बच्चों को भी स्वावलंबन का पाठ पढातीं। क्षत्रिय धर्म की शिक्षा देतीं। क्षत्रिय संसार का पालन करते हैं। समाज रूपी शरीर के क्षत्रिय हाथ हैं। क्षत्रिय को मेहनत से ही जीवन व्यतीत करना चाहिये। कम आयु में ही दोनों कुमार ज्यादा ही क्षत्रिय हो गये। निर्भय होकर कानन में विचरते। हिंसक पशु भी उन्हें देख ठिठक जाते। मांसाहारी जीव खायेंगे तो मांस ही पर कोई भी हिंसक जीव उनके समक्ष नवजात पशु और उसकी माता का शिकार नहीं कर सकता था। निर्बल को कैसे बचाया जाये, इसका अभ्यास करते। अक्सर शेर, व्याघ़ को खदेड़ देते। आश्रम की दूसरी स्त्रियां घबरा जातीं। दोनों को ऐसी बहादुरी न दिखाने की सलाह देतीं। पर इन सबसे परे सीता अपने बच्चों को अन्याय के खिलाफ लङने के लिये शाबासी देतीं। सीता की छवि एक मेहनती पर बेरहम माता की थी। भला यह भी कैसी माता जिसे अपने बच्चों का जीवन ही प्यारा नहीं है। सीता बच्चों को जीवन की असारता समझाती। दोनों कुमारों का व्यक्तित्व क्षत्रिय और तपस्वी का मिश्रण था।
महर्षि बाल्मीकि कुमारों को शस्त्र की दीक्षा देते। सीता दूर से ही बच्चों को देखती। बच्चों का अस्त्र संचालन देख उनके पिता की याद करतीं। हर रात स्वप्न में श्री राम से मिलतीं और राज्य की समस्या पूछतीं। श्री राम बच्चों के हालचाल पूछते। बच्चों के लिये कुछ गुप्त ज्ञान बताते। सीता भी कुमारों को वह ज्ञान दे देतीं। विभिन्न दिव्यास्त्रों का ज्ञान कुमारों को महर्षि से मिला। पर जब सीता ने जम्बुकास्त्र और नारायण अस्त्र की शिक्षा कुमारों को दी तो पूरे आश्रम में शोर मच गया। सचमुच सीता कोई क्षत्रिय कन्या है। वह खुद भी अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान रखती है। उसे ऐसे कई अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान है जो खुद महर्षि बाल्मीकि को पता नहीं हैं। महर्षि जानते थे कि इनमें से कई अस्त्र वास्तव में महर्षि विश्वामित्र के आविष्कार हैं जो उन्होंने केवल श्री राम को दिये थे। अपनी अकाट्य विद्या श्री राम सीता को स्वप्न में समझाते और सीता अपने पुत्रों को। फिर एक दिन सीता ने दोनों कुमारों को कुछ ऐसा सिखाया कि युद्ध में भूख और नींद पर नियंत्रण कर कैसे बिना थके लङ सकते हैं। विश्वामित्र जी की अद्भुत विद्या से ही कुमार लक्ष्मण चौदह वर्ष बिना भोजन और बिना नींद के रह पाये।
वन भ्रमण को गये दोनों कुमार वापस नहीं आये। आज पहली बार सीता को चिंता हुई। इतना समय तो कभी नहीं लगा। पर क्षत्रिय कन्या अधीर नहीं हो सकती। पर क्षत्राणी के मन में जो एक माता थी, वह बार-बार व्याकुल हो रही है। आज तक माता पर क्षत्राणी जीतती आयी थी। पर आज पहली बार माता सीता, क्षत्राणी सीता पर हावी हो रही थीं। आखिर क्यों न हो। क्षत्रिय होने की शिक्षा पाये कुश और लव ने महाराज राम का अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकङ चुनौती दे रखी थी। जंगल में भयानक युद्ध में कुश और लव कमजोर नहीं पङ रहे। पर सामने भी प्रबल योद्धा थे।
"भैया। महर्षि बाल्मीकि के हर अस्त्र का ज्ञान इनपर है। हमारे सारे प्रयास विफल हो रहे हैं। क्यों न माता जी के अस्त्रों का प्रयोग करें।"
दोनों कुमारों को इतना तो पता था कि उनकी माता क्षत्राणी है। पर शायद माता की शिक्षा को बहुत महत्व नहीं दे रहे थे। दूसरी तरफ शत्रुघ्न भी उनके अस्त्र ज्ञान से चकित थे। पर आखिर में लव और कुश ने जम्बुकास्त्र का संधान किया। शत्रुघ्न इस अस्त्र से अपरिचित थे। अस्त्र के प्रभाव से गहरी निद्रा में सो गये।
लव और कुश को हर बार बङी चुनौती मिली। पर माता सीता की ही विद्या काम आयी। लक्ष्मण और भरत को बेहोश कर जब हनुमान से संग्राम हुआ तो दोनों हार ही जाते। पर महाबली हनुमान भी माता सीता का नाम लेकर मारे घूंसे को बर्दाश्त नहीं कर पाये। खुद बंधन में बंधे हनुमान विचार कर रहे थे कि किस मंत्र की ताकत से इन बच्चों से उन्हें हराया है। फिर अचानक माता सीता की याद आते ही समझ गये। माता से मिलने का मन था। चुपचाप बंधन में बंध गये। वह माता सीता का ही आशीर्वाद था कि लंका में पूरी रावण की सेना को परास्त कर आग लगा दी थी।
कुछ ज्यादा ही देर हो गयी। सीता अपने बच्चों को ढूंढने निकल पङीं। पर सामने हनुमान को बांधकर लाते हुए दोनों बच्चे दिख गये। अरे यह तो हनुमान हैं। बच्चों ने इन्हें बांध रखा है। अपने धर्म के प्रथम पुत्र के लिये ही सीता शायद व्याकुल थीं। भागकर आयीं और हनुमान को बंधन मुक्त किया।
"माता। आज बहुत दिनों बाद आपके दर्शन हुए।" हनुमान को माता के चरणों में गिरते देख न तो लव और कुश समझ सके और न आश्रम वासी स्त्रियां। पर शीघ्र ही एक और आश्चर्य से सभी का परिचय हुआ। अपने बच्चों को वर्षों से स्वावलंबन का पाठ पढाने बाली सीता, वास्तव में अवध की रानी हैं। देव इतना निष्ठुर होता है। जीवन भर पति का साथ दिया। उनके साथ वन के कष्ट सहे। बलशाली रावण की बंदी होकर भी कभी नहीं झुकीं। और स्वाभिमान के कारण फिर राज्य त्याग उनके साथ आश्रम में रहीं। श्री राम की पत्नी सीता के प्रति इनमें भी कइयों के विभिन्न भाव थे। पर इतने वर्षों से संयम और त्याग की जिस मूर्ति को अपने साथ देखा, उसकी पवित्रता में किसी को संदेह न था।
महाराज राम खुद अश्व लेने आ पहुंचे। सीता और हनुमान को दो बच्चों के साथ अश्व के पास देखा। दोनों के नैत्र आंसुओं से गीले थे।
"महाराज। आपको किसी शिकायत का मौका नहीं दिया। आपके दोनों पुत्र आपकी ही तरह अस्त्र विद्या में दक्ष हैं।"
"सीते। अभी कितना तङपना है। तुम्हारी याद अक्सर वैचैन कर देती है।"
"महाराज। आप खुद राजा हैं। राजा को अधीर नहीं होना चाहिये। कर्तव्य पथ पर चलते समय जो भी वाधा आयें, उन्हें आपको पार करना है। "
इन्हीं बातों को सीता हर रात श्री राम से स्वप्न में कहतीं। आज सभी के समक्ष कहने लगीं। सीता के त्याग, प्रेम और स्वाभिमान को देख लोगों की आंखें आंसुओं से भीग रहीं थीं।
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कुछ लव और कुश के प्रयास थे और कुछ आश्रम वासियों की मेहनत, नगर में सीता को वापस बुलाने की मांग उठने लगी। सचमुच सीता जैसी पवित्र स्त्री तीनों लोकों में कोई नहीं है। लव और कुश दोनों श्री राम के ही पुत्र हैं। कितना तेज इनके चेहरे पर है। सुना है कि अकेले चतुरंगनी सेना का सामना किया था। यह तो श्री राम की खासियत रही है। बचपन में ही श्री राम ने महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की अकेले रक्षा की थी। वही तेज इन कुमारों में है। भला अब सीता पर क्यों संदेह किया जाये। श्री राम जैसे राजा के राज्य में रहने का सौभाग्य मिला है। प्रजा की इच्छा के लिये खुद का जीवन कांटों का कर लिया। पर अब नहीं। दोनों प्रेमियों का और विछोह नहीं होगा।
सीता के प्रति प्रजा के विचार श्री राम को हर्षित तो करते पर कुछ अभी भी सीता को पवित्र नहीं कहते। राम फिर चिंता के समुद्र में घिर जाते। पर देवी सीता के समर्थकों की संख्या बढती जा रही थी। और विरोधियों की आखरी बात इतनी रह गयी कि उन्हें सीता को पवित्र मानने में कोई दुख नहीं है। बस सीता जनता के समक्ष अग्नि परीक्षा ले लें।
"नहीं। इस तरह एक सती स्त्री को बार बार अग्नि परीक्षा के लिये वाध्य नहीं कर सकते। सीता ने पहले ही अग्नि परीक्षा दी थी। खुद अग्नि देव ने उन्हें अपनी धर्म की पुत्री माना था।"
"अच्छा। तो आपने वह परीक्षा देखी थी। वानर और भालुओं के मध्य किसी परीक्षा को हम नहीं मानते। "
विवाद गहराता जाता। तर्क और वितर्क होते रहते। इनसे अलग देवी सीता समझ रहीं थीं कि अब प्रजा की भलाई के काम बंद हैं। प्रजा में देश को उन्नत बनाने की चाह बंद है। कितना भी जरूरी मुद्रा हो पर हर मुद्दे की एक सीमा होती है। राज काज एक ही मामले की भेंट चढता, प्रजा शासन नीतियों की उपेक्षा का शिकार होती उससे पहले देश की रानी ने अभूतपूर्व फैसला ले लिया। प्रजा को अब इस मुद्दे पर अधिक नहीं भटकने दिया जायेगा। देश की रानी सीता फिर एक बार प्रजा को अपनी पवित्रता दिखाएगी ताकि राजा के जीवन की बेमतलब की बातें बंद हों। देश फिर पहले जैसे उन्नति के पथ पर आगे बढे।
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अयोध्या नगर के दरबार में इतनी जगह न थी। एक विशाल मैदान में आज दरबार लगा। जो भी था, आज दरबार की तरफ भागा जा रहा था।
देवी सीता ने गुरुओं, अपनी तीनों सास और अंत में अपने प्राणेश्वर श्री राम को प्रणाम किया। जब सीता के मुख से ओजस्वी वाणी निकली, चारों तरफ शांति छा गयी। एक एक शव्द इतने गहरे थे कि कोई प्रतिवाद न कर सका।
"आगंतुक प्रजाजनों। मुझे ऐसा कोई कारण नहीं दिखाई देता कि मैं आपके समक्ष अपने पति से प्रेम का प्रमाण दूं। प्रेम तो मन की भावना है। इसका प्रमाण हमेशा दूसरे का मन ही होता है। विश्वास के धागे पर एक दूसरे के कल्याण की कामना करना, पति और पत्नी का कर्तव्य है। दोनों का यह भी कर्तव्य कहा है कि दोनों एक दूसरे को धर्म के पथ पर बढायें। अधर्म से बचायें। जीवन भले ही समाप्त हो जाये पर जीव की यात्रा अनंत है।
मेरे पति कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। देश के राजा का कर्तव्य खुद बहुत बङा होता है। मैं नहीं चाहती कि भविष्य में भी कभी कोई उन्हें कर्त्तव्य से अलग हुआ बोले।
यदि हम दोनों एक दूसरे के मन की बात समझते हैं। यदि मेरा राज्य त्यागने का निर्णय केवल प्रजा कल्याण ही है, यदि आज भी मैं इस समुदाय में केवल इसी लिये आयी हूं कि प्रजा का जीवन अपनी सामान्य चाल से चलना शुरू हो जाये तो धरती माता मुझे अपने अंदर शरण दें। यदि दुबारा अग्नि परीक्षा में केवल यह सोचकर नहीं दे रही कि ऐसा करने पर भविष्य में उसका उदाहरण देकर स्त्रियों पर अत्याचार किया जायेगा तो माता धरती मुझे अपने भीतर स्थान दें। "
देवी सीता की ओजस्वी वाणी सुनते सुनते किसी को ध्यान ही नहीं था कि सीता कब श्री राम और खुद के प्रेम के साथ साथ, प्रजा बत्सलता और नारी के उद्धार की कामना की प्रतिज्ञा ले चुकी हैं। होश तब आया जब भयानक ध्वनि से भूमि फटी और माता सीता उसमें समा गयीं।
पूरा जीवन दूसरों के लिये जीती रहीं देवी सीता, दूसरों के हित के लिये जीवन त्याग गयीं। पर आज भी हमारे मनों में जीवित हैं। अभी भी मानवता को राह दिखा रही हैं।
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माता सीता का चरित्र सही सही वर्णन कर सके, भला ऐसा कौन सा लेखक हो सकता है। फिर भी कुछ श्रंखला में प्रयास किया है।
जय सीता राम।
दिवा शंकर सारस्वत "प्रशांत"

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