अयोध्या के नरेश राम दरवार में सुशोभित थे। तीनों भाई, गुरुदेव वशिष्ठ, बुद्धिमान मंत्री सुमंत्र तथा और भी कई लोग दरवार में उपस्थित थे। लक्ष्मण और शत्रुघ्न द्वारा हवा किये जाते और हनुमान द्वारा चरणों की सेवा किये जाते भगवान की झांकी बङी मनोहर लग रही थी। बस कमी थी तो माता सीता की। पर अब यह कमी पूरी नहीं हो सकती। प्रजा के अनुपयुक्त आक्षेप के कारण देवी सीता राजमहल छोङ चुकीं थीं। राजा होने का फर्ज निभाते निभाते श्री राम का जीवन दुखों का पर्याय बन चुका था। पर अपने दुखों को एक तरफ रख श्री राम राजा होने का फर्ज निभाते। बंद कमरे में सीता की याद में आंसूं बहाते। स्वप्न में भी सीता को ही देखते।

स्वप्न में सीता कहतीं - मेरे प्राणेश्वर। आप इतने दुखी क्यों हैं।
राम - सीते। तुम्हारे वियोग की अग्नि जला रही है।
सीता - पर वियोग हुआ ही कब है। मैं तो हर रात आपके स्वप्न में आती हूं।
राम - सीते। तुम कहाॅ हों। मैं अब राज्य करते करते ऊब चुका हूं। धन वैभव मुझे चुभोते हैं। वहीं चलते हैं। चित्रकूट में कितना चैन था। वहीं कुटी बनाकर जीवन गुजार देंगें।
सीता - नहीं स्वामी। राजा का धर्म प्रजा का पालन करना है। प्रजा तो राजा की संतान कही है। आप अपने फर्ज से भाग नहीं सकते।
राम - सीते। भरत कुशल राजा रहेंगे। उन्होंने चौदह वर्ष शासन सम्हाला है। अब हम और तुम कहीं चैन से जीवन बितायें।
सीता - स्वामी। अभी आपने मेरा विचार नहीं किया। आने बाली पीढिय़ां कहेंगीं कि सीता ने रघुकुल के राजा को अपने प्रेम जाल में फसाकर उसके कर्तव्य से विमुख किया। क्या आप चाहते हैं कि अब मुझपर और दोषारोपण हो।

राम निरुत्तर रह जाते। स्वप्न में ही अपने पुत्रों के हालचाल ले लेते।

सोचते कि रात कभी खत्म ही न हो। स्वप्न कभी न टूटे। पर ऐसा होता नहीं। रोज सूर्य वंश के देव भगवान भाष्कर आकर श्री राम को उनके कर्तव्य का स्मरण करा देते।

आज श्री राम का मन दरवार में लग नहीं रहा। भीतर से आवाज आ रही कि कोई परेशान है। न्याय चाहता है। पर राम के दरवार में किसे रोक। कोई भी कभी भी अपनी परेशानी सुना सकता है।

दरवान को बुलाकर कहा कि देखो कहीं कोई परेशान दरवार के द्वार पर बैठा तो नहीं। दरवान चला गया और शीघ्र वापस आया।
'महाराज की जय। आज कोई भी फरियादी नहीं है। वैसे भी श्रीमन के दरवार में आने बाले फरियादी को हम रोकते नहीं हैं।'

श्री राम का अंतर्मन कह रहा था कि कोई तो तकलीफ में है। पर यह भी सत्य था कि कोई फरियादी नहीं आया।

'लक्ष्मण। तुम जाकर देखो। बाहर जो भी दिखे, मुझे सच सच बताना। '

लक्ष्मण बाहर गये और थोङी देर में वापस आ गये।

' महाराज। दरवान सही कह रहा है। बाहर कोई फरियादी नहीं है। बस एक कुत्ता बाहर बैठा है।'

लक्ष्मण ने जो देखा वही कह दिया।

'लक्ष्मण। उस कुत्ते को दरवार में ले आओ। '

कुत्ते ने दरवार में आकर श्री राम के चरणों में प्रणाम किया और मनुष्यों की वाणी में कहने लगा। कुत्ते का मनुष्य की भाषा में बोलना महान आश्चर्य का विषय था। 

' तीनों लोकों के स्वामी, जगती के पालनकर्ता, अयोध्या नरेश के चरणों में इस कुत्ते का प्रणाम। आपने मुझे ससम्मान दरवार में बुलाया है। इसका आभारी हूं।' 

'आपको कोई तकलीफ तो नहीं है। कोई आपको परेशान तो नहीं करता।' श्री राम ने कुत्ते से पूछा। 

'महाराज। आपके राज्य में सब तरफ आनंद ही आनंद है। आजतक मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। पर आज एक ब्राह्मण ने मुझे अकारण डंडा मारा है। महाराज। मेने खुद पिछले जन्म मे धर्मशास्त्र पढे हैं। मेने किसी भी पवित्र स्थान को कभी दूषित नहीं किया। मंदिर और यज्ञशालाओं को दूर से ही प्रणाम कर लेता हूं। मेरा कोई अपराध मुझे याद नहीं आ रहा। फिर भी एक ब्राह्मण ने मुझे अकारण डंडा मारा है। '

एक तो कुत्ते का मनुष्य भाषा में बात करना ही महान आश्चर्य का विषय था। ऊपर से कुत्ते का धर्म शास्त्र का ज्ञान भी दरवारियों को आश्चर्यचकित कर रहा था। श्री राम का संदेह निर्मूल नहीं था। वास्तव में कोई फरियाद के लिये दरवार के बाहर बैठा था। इतना जरूर कि फरियादी एक कुत्ता था।


ब्राह्मण को दरबार में बुलाया गया।

'आपने इस कुत्ते को डंडा मारा। इसका क्या अपराध था। क्या इसने कोई खाद्य वस्तु झूठी कर दी। किसी पवित्र स्थल को अपवित्र किया।'श्री राम ने उस ब्राह्मण से पूछा।

ब्राह्मण काफी देर बोल न पाया। अंत में अपना अपराध स्वीकार करते हुए बोला - 'महाराज। इस कुत्ते का कोई अपराध नहीं है। मेने क्रोध के वशीभूत होकर यह अपराध कर दिया है। महाराज मुझे दंड दें। मैं अपराधी हूं। मुझे दंड मिलना चाहिये। '

अब सब कुछ साफ था। पर ब्राह्मण को क्या दण्ड देना चाहिये, इस विषय में राय एकमत नहीं थी।

'यदि महाराज की आज्ञा हो तो मैं भी कुछ कहना चाहता हूं। 'कुत्ते ने प्रणाम कर कहा।

' कहो। तुम्हें आज्ञा है। '

श्री राम की आज्ञा के साथ ही कुत्ते कहने लगा -' महाराज। हमारे राज्य के बाहर जो देवी मंदिर है, उसके मुख्य पुजारी का पद रिक्त है। मेरी प्रार्थना है कि आप उस पद पर इन ब्राह्मण देवता को नियुक्त कर दें। '

' नहीं महाराज। मुझे कोई अन्य दण्ड दें। मैं कठिन से कठिन दण्ड को स्वीकार कर लूंगा। पर मंदिर का मुख्य पुजारी मुझे न बनायें। 'ब्राह्मण के कथन में याचना थी।

कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। कुत्ता अपने अपराधी को मंदिर का मुख्य पुजारी बनाना चाह रहा था। और ब्राह्मण पुजारी बनने को तैयार नहीं था।

' श्रीमन स्वान। आप निश्चित ही कोई महान आत्मा हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी का रहस्य क्या है।'

श्री राम के पूछने पर कुत्ता कुछ देर शांत रहा। फिर धीरे धीरे कहने लगा - 'महाराज। पूर्व जन्म में मैं एक प्रतिष्ठित मंदिर का मुख्य पुजारी था। मंदिर पर चढने बाली संपत्ति निश्चित ही समाज की और मंदिर की कही जाती है। पुजारी को ऐशोआराम की जिंदगी नहीं जीनी चाहिये। यह सब जानता था। पर सामने संपत्ति देख अपने पर नियंत्रण करना सभी के वश की बात नहीं। पुजारी उस संपत्ति का रक्षक है न कि मालिक। जैसे राजा देश का सेवक है न कि मालिक। पर यथार्थ में ऐसा होता नहीं। कुछ ही लोग अपने कर्तव्य पर डटे रहते हैं। यह उनके आत्मबल पर निर्भर करता है। मेने जनता के धन का प्रयोग खुद के ऐशोआराम में किया। और आज मैं कुत्ते की योनि में हूं। '

सच्चाई जानकर श्री राम सहित सभी दरबारी आश्चर्य में पङ गये। सचमुच गलत और सही का फैसला तो विचार तय करते हैं न कि क्रियाएं।

सारे तर्क सुनकर श्री राम ने अपना न्याय सुनाया -' 

'सारे तर्कों को विचारकर यह तो स्पष्ट है कि ब्राह्मण ने क्रोध में भरकर कुत्ते को मारा है। कुत्ते का कोई दोष नहीं है। कुत्ते के रूप में उपस्थित महान आत्मा का यह कथन भी सत्य है कि बङे लोगों की जिम्मेदारी भी बङी होती है। एक मंदिर के मुख्य पुजारी का कर्तव्य मंदिर की संपदा का प्रयोग जन कल्याण के लिये करना है। न कि खुद के ऐशोआराम में। इन ब्राह्मण देव ने अपनी भूल स्वीकार की है। तो इन्हें प्रायश्चित का मौका भी मिलना चाहिये। तो मैं निर्णय देता हूं कि यह ब्राह्मण देव उस देवी मंदिर के मुख्य पुजारी नियुक्त किये जाते हैं। अब आप मंदिर की संपदा को जन कल्याण में प्रयोग कर अपने पाप का प्रायश्चित करेंगें। और यदि आपने उस संपत्ति का खुद पर प्रयोग किया तो निश्चित ही ईश्वर के दरवार में जो दण्ड मिलेगा, वह आपके समक्ष प्रत्यक्ष है। '

श्री राम के जयनाद से धरती और आसमान दोनों गूंज उठे। खुद देवताओं ने पुष्प अर्पित किये। इन सबसे अलग श्री राम रात का इंतजार कर रहे थे। क्योंकि कुछ प्रश्नों के उत्तर देने बाली केवल रात में उनके स्वप्न में मिलती थीं। 

' स्वामी। आज आपके जयनाद सुनाई दिये। सचमुच मनुष्य ही नहीं अपितु आपके राज्य में पशु और पक्षियों तक को न्याय मिलता है।' स्वप्न में सीता ने श्री राम को बधाईयाँ दीं। 

'सीते। यह सत्य नहीं है। मेरे राज्य में भी अन्याय हुआ है। पशुओं तक को न्याय देने में ख्याति प्राप्त मैं अपनी धर्मपत्नी को न्याय नहीं दिला सका। खुद तुम्हारे विरह में तप रहा हूं। सभी को अपने कर्मों का प्रायश्चित करना है। मैं भी प्रायश्चित कर रहा हूं। मेने अपनी पवित्र पत्नी पर अन्याय किया है। '

' नहीं स्वामी। इसे धर्म संकट कहते हैं। हर व्यक्ति के जीवन में एक बार तो यह क्षण आता है। सामान्य लोग स्त्री, पुत्र के मोह में बंध जाते हैं। पर महान लोगों का जीवन तो दूसरों के लिये होता है। आप बहुत महान हैं। आप दूसरों के लिये जीते हैं। '

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पौराणिक कहानी को कुछ अपने मन से बदलकर आपके समक्ष प्रस्तुत किया है। महान लोगों के आचरण को समझना आसान नहीं है। फिर भी प्रयास किया है।





         दिवा शंकर सारस्वत "प्रशांत"