जलतरंगें झूम उठीं,
 मछलियां सतह पर आ गई।
 हंस हंसिनी रास रचाने लगे ,
जो पायल तू छनका गई।

 कलियां ,फूल मुस्कुरा उठे,
हिलोरे पवन लेने लगा।
 बागों में बहार आ गई, जो पायल तू छनका गई।

 चांद जल्दी निकल आया,
 सूर्य भी पछता रहा था। क्यों ना उसे भी खबर हो पाई,
जो पायल तू छनका गई।

 मचल उठे कितने दिल, प्यास  कितने दिलों की बढ़ गई।
 आ गए मयखाने से वापस ,
जो पायल तू छनका गई।

 तेरे पायल की छन-छन, आशिकोंं के दिलों दिमाग में छा गई।
भूल गए हर जरूरी काम, जो पायल तूछनका गई।

तेरे पायल की छनक में, वो कशिश है जानेमन। अच्छे अच्छों की कसम तुड़वा गई।
जो पायल तू छनका गई।

 स्नेह लता पाण्डेय 
    नई दिल्ली