हर किसीका मन लुभाता मेला।
बच्चों को तो खूब भाता मेला।
कोई हँसता कोई रोता है मेले में।
अच्छों का भी मन भटकाता मेला।
मिलना बिछड़ना तो हुवा करता।
पर कभी भी ना रुक पाता मेला।
रोते रोते गिरना, रोनी सूरत होनां।
बेपरवाह बन सब को घुमाता मेला।
हँसते हँसते घूमे हर दुकान रुके।
कुछ न कुछ खरीद के लाता मेला।
प्रेम मिलन में जोग भी बन जाते।
दिल सबके गोल घुमाता मेला।
यह दुनिया भी एक मेला कहलाये।
इन्सां आये जाये ना रुकता मेला।
मेले दुनिया के चलते ही रहेंगे सदा।
लोग मर जाये, कुछ नया लाता मेला।
दुनिया के मेले में खो जाये तमाम।
एक जाये और दूसरा आता मेला।
फील्मों में देखने को मिले बारबार।
मेले में खो जाये, फिर मिलाता मेला।
चल रहे हैं और चलते रहेंगे हमेशा।
काश! हर दिन हमें मिल पाता मेला।
फिरोज दहिवाला

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