आओ तुमको आज सुनाऊँ,,
एक कहानी मै अपनी....
उम्र ,के उस पायदान पर,,
एक .रवानी मै अपनी""
समय ,शायद सोलहवा"
बंसत था"
स्कूल का वो ग्राउन्ड था"""
बैटमिटंन.का शौक चढा था"
धुन्ध का मौसम छाया था"""
कोहरा इतना गहन प्रबल था"
हाथ को हाथ न सूझ रहा"""
दूर खडा .कोई एक नायक"
नायिका,को घूर रहा""""
सूर्य देव की बाट जोहते"
आधा,टाईम निकल गया"
खेल अभी तक शुरू हुआ न"
सारे  श्रोता भाग गए"
बस हम तीन ही बचे "
पहली पारी खेल गये"
एक खिलाडी .की तालाश मे"
फिर तीनो हर ओर गये"
अब तक ,कोहरा छँट चुका था"
नजर आ रहे थे चेहरे"
एक युवा दूर खडा ,कब से"
फेकं रहा ,वो मोहरे"
उसपर नजर पडी जो मेरी"
साँसे मेरी रुक,सी गई"
खेल छोड कर जब मै"
भागी,वो भी कुछ शर्मसार,
हुआ ,उल्टे पैर वहाँ से भागा"""
कोच तब हैरान हुआ,,,
घर पहुँची लम्बी साँसे ली"
माँ .चिन्तित से देख रही""
था सवाल उनकी आँखो मे"
बेटी को वो भाँप गई""
माँ ,ने पूछा क्या है बेटा"
मै ,तब बाते टाल गई"""
रात मेरी आँखो मे बीती""
सारी बाते,साज रही"""
सुबह हुई"माँ पास खडी थी"
बोली,बेटा उठ जाओ"
कल से तुमको ,भला हुआ क्या"
कुछ तो मुझको,बतलाओ"
नींद मे मै ,कुनमुनाई"आँखे हौले"
से खोली"बाल सुलभ मन से मै "
बोली ,मेरी  आँखे चार हुई"""""
सभी हँसे ठहाके मार कर ,,
मै फिर शर्म सार  हुई"वो  मेरे"
पति देव थे ,जिनसे आँखे चार हुई"""""


   रीमा ठाकुर (लेखिका)