वृद्धाश्रम की देहरी पर, 
छोड़ गया बेटा, 
छोड़ गया बेटा, 
हमने क्या गुनाह किया..? 

न कुछ सोचा, 
न ही कुछ समझा, 
बातों में बीबी की!!
उलझ गया, 

वृद्धाश्रम की, 
ड्योड़ी पर बैठा, 
चिलमन से!!
झांक रहा मैं, 

शायद कोई, 
अपना आ जाये, 
हाल चाल!!
पूछने मेरा, 

दूर दूर तक, 
दौड़ रहीं निगाहें, 
सूनी आँखे!!
सूनी पड़ीं राहें, 

पथराई आँखे, 
राह तक तक कर, 
आया न कोई!!
मुझको नज़र, 

जर जर ये काया, 
याद करे, 
अपनों को!!
रो रो कर, 

माँ बाप का, 
तू था सहारा, 
इकलोता!! 
प्यारा बेटा, 

बड़ी मन्नतों से, 
पाया था, 
तुझको हमनें, 
क्या गुनाह किया..? 

नाजों से बड़े, 
पाला हमनें, 
तुझको, 
क्या गुनाह किया..? 

रात रात जागी, 
तेरी माँ, 
तुझे सम्हाला, 
क्या गुनाह किया..? 

चूल्हा चौका, 
करते करते, 
झौंका जीवन, 
क्या गुनाह किया..? 

ऊँगली पकड़ कर, 
सिखाया चलना, 
तुझको हमने, 
क्या गुनाह किया..? 

पिस गये हम, 
कौल्हू के, 
बैल बनकर, 
क्या गुनाह किया..? 

हर ख्वाईशों को, 
तेरी पूरा, 
करा था हमने,
क्या गुनाह किया..? 

मर्जी थी तेरी, 
पसंद की बीबी, 
शादी करी मर्जी से, 
हमने क्या गुनाह किया..?

बीवी तेरी बड़ी, 
आई नकचढ़ी, 
रोज बवाल करे, 
हमने क्या गुनाह किया..?

रोज की झझंटे,
रोज की चिकचिकें,
हुआ तू हैरान, 
हमने क्या गुनाह किया..? 

हम वृद्ध जनों का, 
न आदर न, 
सम्मान कोई, 
हमने क्या गुनाह किया..? 

संस्कारों का, 
अता पता नहीं, 
समझे कूड़ा करकट,
हमने क्या गुनाह किया..? 

हमारे लिए, 
दो दो रोटी, 
बनाना न मंजूर, 
हमने क्या गुनाह किया..? 

तू था प्यारा बेटा, 
फँस गया, 
दो पाटन के बीच, 
हमने क्या गुनाह किया..? 

बीबी को तो, 
न निकाल सके, 
दिमाग घूम गया, 
हमने क्या गुनाह किया..? 


जन्मदाता को, 
अपने करा बाहर,
वृद्धाश्रम छोड़ दिया, 
हमने क्या गुनाह किया..? 

माँ की ममता को, 
तार तार किया, 
दूध को तूने लजा दिया, 
हमने क्या गुनाह किया..?

प्यार में तेरे पड़ कर, 
दौलत अपनी हमने, 
कर दी तेरे नाम, 
हमने क्या गुनाह किया..?

वृद्धाश्रम की देहरी पर, 
बैठा मैं सोच रहा, 
कर्मगति टारे न टरे, 
हमने क्या गुनाह किया..?

वृद्धाश्रम की देहरी पर, 
छोड़ गया बेटा, 
छोड़ गया बेटा, 
हमने क्या गुनाह किया..? 


     काव्य रचना -रजनी कटारे 
           जबलपुर (म. प्र.)