खड़ी थी मैं दरिया किनारे
देख रही थी
बादलों की छाई काली घटा
क्षितीज पर थी लालिमा
इन्द्रधनुषी चूनरी ओढ़े ताक रहा था आसमां
कह रहा था गरज कर 
हे आलि! कहां खो गई तेरी हरियाली
क्यों हुई बंजर 
आंखों में दर्द की बुंदे लिए कहती है भूमि
हे सखा! कैसे कहूं क्या कहूं
वर्षों जिसे पाला पोसा
उसी इंसान ने घोंपा है खंजर।
देख कर यह मंजर
रो पड़ा आसमां
ठहर ना सका
बुंद बुंद में प्यार का सागर समेटे हुए
मिलने को बेताब हुआ
बस बरस पड़ा 
बस बरस पड़ा।।

पिंटू कुमावत'श्याम दिवाना'🙏🙏💐💐