मंजिल पाने की राह में क्या क्या पड़ा खोना।
वो मां के हाथों की चुपड़ी रोटी,
वो मां की गोदी से चिपक कर सोना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
वो सुबह देर तक बेफिक्र सोना,
मां के जगाने पर भी करवटें बदलना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
वो स्कूल से आने को घड़ी को ताकती नजरें,
मेरे आते ही मां के चेहरे का खिलना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
वो प्यारे से आंचल की ठंडी छांव,
वो प्यार से बालों में हाथ फिराना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
वो बचपन के खेल और लड़ना झगड़ना,
वो छोटी छोटी बातों में रूठना मनाना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
कितना कुछ बदला है, आज पीछे मुड़कर देखा,
जिस दरवाजे पर था खिला सा चेहरा, ममता भरी नज़रें,
आज तो उसे थक हार कर, खुद ही पड़ता है खोलना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
कहां गए वो फुर्सत के दिन, ममता भरी नज़रें,
वो भगवान की सूरत सा प्यारा चेहरा,
क्यों जरुरी है ये अनमोल पल खोकर,बस मंजिल को पाना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
अजीब से कुछ सवालों के जवाब ढूंढने में,
कितने दिन बीते खुद को ख़ुद से ही मिलने में,
रेत से फिसलते वक्त के बाद,बचता है बस यादों का बिछौना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
जिंदगी के कुछ अहसास होते हैं इतने मीठे,
चाह कर भी इनके अक्श मिट नहीं पाते,
काश! इस काश का भी कोई मतलब होता,
तो गुजरा जमाना भला कौन न चाहे पाना।
सफलता की चाह में क्या क्या पड़ा खोना।
मंजिल पाने की राह में क्या क्या पड़ा खोना।
.......✍️🙏🌅 ऋतु बाजपेई

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