सही गाना है, "जिंदगी के सफर में गुजर जाते है जो मुकाम वो फिर नहीं आते ... वो फिर नहीं आते..."

....पर उस सफर की यादे तो बराबर आती है । माना सब सफ़र की नहीं पर कुछ journey अपनी स्पेशल बन जाती है और उसमे भी ऐसी यात्रा जो काफ़ी परीक्षाओ से गुजरी हो उसके तो कुछ खट्टे तो कुछ मीठे अनुभव मानो मन रूपी शिलालेख पर अंकित हो ही जाते है। अरे उसका नाम भी तो अंकित था। पढ़िए समझ जाएंगे आप सब।

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    क्या जरूरत है मिहिर की शादी में सामिल होने की? चार दिन पहेले ही तो इनविटेशन कार्ड भेजा वो भी सिर्फ व्हाट्सएप पर। मनीष मामा प्रीतेश की जिद्द पर नाराज होते हुए साथ गुस्से में बोले।

में मोहिनी , घर तो मेरा अहमदाबाद है पर अभी महेमान बनी हूँ महानगरी , माया नगरी मुंबई की , जी हाँ मेरे मामा के यहाँ छुट्टियों में आयी हुई थी, और ये बहस चल रही थी मेरे मामा के लड़के प्रीतेश जो एक इंजीनिअर साथ हैंडसम, स्मार्ट मेरा एक लौता कजिन भाई और मेरे दिलदार, प्यारे पर उसूल वान और अनुशासन प्रिय मामा मनीष जी के बीच।

में क्या बोलती मुझे कुछ समझ नही आ रहा था , कही प्रीतेश की बात सही लग रही थी, क्योंकि आखिर मिहिर उसका इंजीनियरिंग के हॉस्टल लाइफ के समय का बेस्ट फ्रेंड जो रहा था और इतना व्यवहार दोस्ती के नाते माफ़ कर सकते है,  तो कहि मामा जी उनके हिसाब से सही थे , बेस्ट फ्रेंड तो सबसे पहेले अपने दोस्त को बुलाता है फिर ऐसा कैसे? और उनकी दीर्घ द्रष्टि में कुछ पुरानी घटनाएं भी दर्ज थी बस उन सबके चलते उनकी साफ़ मनाई थी।

आखिर प्रीतेश की जिद्द ने तो कही मामी और मेरी भी थोड़ी बहुत की हुई सिफारिश ने बेमन से मामा जी से अनुमति दिलवा ही दी ।

संयोग से शादी भी गांधीनगर (गुजरात) में हो रही थी और मेरे भी ग्यारवी कक्षा के कोचिंग क्लास एकदम से शुरू होने की न्यूज़ आ गयी। इन दौरान टिकिट बुक कराने , प्रीतेश ने ऑनलाइन सर्च किया पर माहौल भी शादियों और त्योहारों के होने के कारण हम लोगो को रिजर्वेशन मिल नही रहा था।

प्रीतेश बोला, देख मोहिनी अब रिजर्वेशन तो तीन दिन तक मिलने से रहा, अगर तुम रेडी हो तो आज ही रात की गुजरात मेल, भुज एक्सप्रेस या लोक शक्ति इन में से किसी भी एक ट्रैन में वेटिंग टिकिट लेकर बेठ जाते है, सीट के लिए टी टी ई से पैसे-वैसे देकर निपट लेंगे।

में स्टंट करने में हमेशा आगे रहने वाली लडकीयो में से हूँ और ये प्रीतेश भी जनता था, मेने भी बोल दिया चलो में तो तैयार हूँ।

बस रात को दस बजे की गुजरात मेल पकड़ी। जल्दी स्टेशन पहुँच गये थे उसका फायदा ऐसे हुआ की टी टी ई का काम कुली ने ही कर लिया। सौ - दोसो रुपये में ही उसने हमारे लिए सीट जनरल में रोक कर सेट कर दी।

मुझे , ये कुली लोगो की भी इतनी बड़ी पहुँच होती है वो उस दिन पता चला। खैर, असली सफ़र तो तब शुरू हुआ जब आगे के मुंबई सेंट्रल स्टेशन से गाड़ी हमको लेते हुए दादर से गुज़र कर बोरीवली स्टेशन पहुँची। अब तक तो कुली की दया से मिली सीट पर जनरल डिब्बे में,  में और प्रीतेश आराम से समान पसार कर लेट रहे थे पर बोरीवली से इतनी भीड़ चढ़ी की लोगो ने हमारे जैसे सोते हुए लोगो को भी हिला चिल्ला कर उठाने लगे। में और प्रीतेश समझ गये सोना तो इस सफ़र में मिलने से रहा। कुली से कहीं छलावा गये।

इतने में ही दो भाई हमारे पास आकर रिक्वेस्ट के टोंन में बोले , कृपया आप बेठ जाये तो हमारे लिए भी बैठने की जगह हो जाये।

हमने भी बोला हाँ क्यो नहीं, वैसे भी ये लोग नहीं बैठते तो कोई न कोई तो हमको उठाके बेठ ही जाता, ये बात हम दोनो अच्छे से जानते थे। ऊपर से इतनी सभ्यता से बात की और दिखने में भी सज्जन लगे , मेने तुरन्त अपना समान जो सीट के ऊपर फैलाके रखा था उसको सीट नीचे सेट किया और जगह कर दी।

एक भाई तो काफी यंग और हैंडसम शूट बूट में थे तो दूसरे भाई के बाल कुछ कुछ सफेद तथा चश्मा , कुर्ता पायजामा पहने हुए और चहरे से उम्र लग रही थी क़रीब 50 साल।

हैंडसम भाई ने बोला , चाचा जी क्या करना है इसमें सफ़र करना है की ट्रावेल देखे???

अरे अंकित, रहने दो... अब बताओ वॉल्वो बुक थी, वो तो मुंबई के ट्राफिक का अंदाजा नहीं था और छूट गयी और वैसे भी मेरे ख्याल से सूरत से ट्रैन खाली होगी और सोने लायक जगह हो जायेगी , जो मुझे नित्य अप डाउन कर रहे लोगो ने बताया।

ठीक है चाचा जी वैसे भी अब end moment पर और शादियों की season में ट्रावेल में टिकिट मिलने पर भी प्रश्नार्थ है।

में और प्रीतेश एक दूसरे के सामने देख हँसे और मन ही मन सूरत से से सोने लायक जगह होगी ये सुन ख़ुश हुए । 

में और प्रीतेश आमने सामने window seat पर बैठे थे , तथा मेरे पास वो चाचा जी बैठे थे, तथा प्रीतेश के पास वो अंकित भाई, जिनका नाम अभी मेने पास बैठे चाचा के मुख से सुना था।

सूरत तक सफ़र काटना था, प्रीतेश ने लैपटॉप निकाला और उसके प्रोजेक्ट की पीपीटी बनाने लग गया , मेने भी अपने पर्स से इयरफोन निकाला और कानो में लगा कर म्यूजिक की दुनिया में खो गयी। चाचा जी तो सीट पिछे सिर टिका कर सो रहे थे और वो अंकित भाई ने कोई bussines रिलेटेड बुक निकली और पढ़ने लगे। एक अलग ही इत्तफ़ाक था हम चारो का जनरल में सफर करने का बाकी कभी शूट बूट वाले या लैपटॉप वाले को जनरल में देखा???? ख़ैर...

हालांकि अपनी आँखे जो आसपास देखती है मन उस पर कुछ प्रतिक्रिया जरूर करता है, जो मेरे मन ने भी सोचा की नॉवेल , newspaper, मेगेज़ीन सब छोड़ ये भाई तो बिजनेस रिलेटेड बुक पढ़ रहे है, जरूर well aducated होंगे। ख़ैर सीट देने पर उनके कहे हुए थैंक्यू और हमने बोला हुआ वेलकम के अलावा कोई बात चीत हुई नहीं थी।

एक घण्टे क़रीब तो हम सब अपने अपने में व्यस्त थे , बाद में जब स्टेशन आया तब हमारा ध्यान कोनसा स्टेशन आया ये देखने में बटा।
हम चारो के बीच फिरसे बात चित हुई।

खिड़की से ज़रा देखिए तो कोनसा स्टेशन है? अंकित भाई मुझे और प्रीतेश को देखते हुए बोले।

"रूट टाइम टेबल वाले टाइमिंग के हिसाब से 'पालघर' होगा।" प्रीतेश बोला।

"हाँ , प्रीतेश अंदाजा सही है पालघर के बोर्ड को देखते हुए  में बोली।"

तो आपका नाम प्रीतेश है? अंकित भाई बोले,

हाँ जी, क्यो? 

मेरे पिताजी का यही नाम है, आपने उनकी याद दिला दी।

इतने में ही वो चाचा बोले, "अब तो घर पर जाता है न तू?"

जी चाचा जी अब तो सवाल ही नहीं है नाराजगी का।

ये बातें कुछ पर्सनल थी सो हम में से किसीने कुछ नहीं पुछा।

प्रीतेश बोला क्या करते है आप?

उन्होंने बताया बिजनेस और ये मेरे अशोक चाचा जो अहमदाबाद में स्कूल के प्रिंसिपल है।

"क्या बात !!! कोनसी स्कूल अंकल जी??"

बेटा, शांति निकेतन 

"ओह मेरे मुँह से तुरंत निकला.... वो वस्त्राल वाली?"

बोले हाँ।

"वाह!!! मेरा छोटा भाई भी तो वहीं पढ़ता है।"

अच्छा क्या नाम है??

"स्वदेश शाह,"

गुजराती जैन हो क्या? अंकित भाई ने पूछा

"मेने भी बोला हाँ जी।"

फ़िर क्या... केम छो?... सु करो छो?... क्या रहो छो?...
करके हम चारो के बीच बात चीत का दौर ऐसा शुरू हुआ की न पूछ्हो बात!!!! गुज्जु गुज्जु मिलेंगे तो ये तो होना ही था।😊 प्रीतेश ने भी इंजीनियरिंग गुजरात से की थी सो वो भी गुजराती समझ लेता था।

अब, वो स्टेशन से होले होले शुरू हुई बात चीत ने भी ट्रैन के साथ साथ मानो रफ़्तार बढ़ाई जिसका अंत सुबह 6.35 पर आये हुए अहमदाबाद के स्टेशन पर हुआ। आश्चर्य न!?

ऐसा तो क्या था वो बात में जिसके लिए हमने सूरत सीट मिलने पर भी सोना नहीं सुहाया???

इतने में ही प्रीतेश बोला यार भूख लगी है।

मेने बेग में रखी हुई केला वेफर निकाल कर दी।

उन लोगो को भी फॉर्मेलिटी हेतु पूछा लीजिए करके
.. पर माना किया जो अच्छा ही हुआ सिर्फ दो ही पैकेट थे जो हमारे लिए भी कम पड़ सकते थे। इन दौरान सबके बीच कॉमन इंट्रोडक्शन चल रहा था, इतने में ही मैंने प्रीतेश को याद दिलाया की मामा को बता तो दिया था न की अपन अच्छे से बेठ गये है???

हाँ , मम्मी से बात कर ली थी अब पापा तो अभी भी नाराज़ होंगे तो उनसे बात करने की हिम्मत नहीं की।

"कोई नहीं , मामी बता ही देंगे और कल पहुँचकर में भी मामा को फ़ोन कर लुंगी।"

इतने में ही अंकित जी बोले , 'तो पापा नाराज़ हैं?'

प्रीतेश ने ज्यादा भाव न देते हुए शार्ट में कहा नही तो..व्व वो तो बस बिना रिजर्वेशन सफ़र कर रहे है इसलिए पापा नाराज़ है हमसे और कुछ नहीं।

मेरे से हँसी छूट गयी, मन में आया कारण तो तुम्हारी जिद्द था।

शायद हमारे चहरे के भाव अंकित जी समझ गये हो अनुभवी जो थे ... हल्का मुस्करा दिए और कोई प्रतिप्रश्न नहीं किया।

पर चुल्बुलाते हुए मेने बोल ही दिया की बात ऐसी नहीं दरसल ऐसी हुई थी।

प्रीतेश मुझे आँखों से घूरते हुए, बड़ी सत्यवादी हरिश्चन्द्र बन रही, शायद उसको उसकी बनी इमेज को गिरानी नहीं थी।

प्रीतेश को शांत करते हुए अंकित जी ने उनका आईकार्ड हमारी तरफ़ दिखाते हुए बोले की , ये मिस्टर अंकित पटेल 
एमडी ऑफ केश्यू बिजनेस आज से आठ साल पहले एक बिगड़ा जिद्दी अन्ना भाई था।

अशोक चाचा बोले , सही है काजू के बिजनेस अहमदाबाद में लानेवाले गिनती के लोगो में से एक है अंकित। और उसकी बायोग्राफी तो बड़ी ही जोरदार है।

प्रीतेश अब अपने आप को उससे बड़ा शरीफ महसूस करने लगा साथ हम दोनो को उनकी बात सुनने में इंटरेस्ट आने लगा।

इस ट्रैन के सफ़र के साथ दूसरा सफ़र शुरू हुआ वो था अंकित जी के जीवन का सफ़र जो मेरी और प्रीतेश की जिज्ञासा से पूछे गये प्रश्न पर इन्होंने विगत से बताया,,,


         आपको क्या लगता है? कितना पढ़ा हूंगा में? अंकित भाई ने पूछा।

जिस तरह आप किताब पढ़ रहे थे साथ बिजनेस मेन भी हो तो MBA साथ मास्टर डीग्री तो होंगी। प्रीतेश बोला

में B.Com पास भी नहीं हूँ, जी हाँ... कॉलेज के अंतिम वर्ष में मुझे घर से निकाल दिया गया था।

ओह्ह!! रियली??/ आश्चर्य से हमारी आंख फ़टी रह गयी। प पप पर वजह??

इतने में ही नाडियाद स्टेशन आया , चाचा बोले चाय पिओगे? हम सबने बोला no thanks... मुझे तो इनकी बाते सुनने में इतनी मशगूल थी कि चाय का सोच भी नहीं सकती थी।

सिर्फ चाचा जी ने एक कप चाय उनके लिए ऑडर की...

"और आगे बताओ ऐसा क्या हुआ??? मेने पूछा।"

अंकित जी के आँखों में हल्का सा दर्द था, बात की शुरुआत करते हुए बोले, अहमदाबाद के प्रभात पटेल का नाम सुना है?

"हाँ , bjp के अध्यक्ष थे वो ही न!??"

हाँ जी वही। 

"उन्होंने तो बहुत अच्छे कार्य किये है। हमारी स्कूल में उनका नाम भी दातारो की लिस्ट में है। पर वो आपके क्या लगते है?"

दादा, हाँ वो मेरे दादाजी थे। जिनके मेरे पर चार हाथ थे। कुछ महीनों पूर्व ही अवसान हो गया।

"ओह्ह। यह पता नहीं था , शायद पढ़ाई के चलते अखबार , tv सब काफ़ी कम कर दिया है मेने , यह वजह हो सकती मुझे नहीं पता।"

कोई बात नहीं, ऐसे प्रतिभावान, दौलतमंद परिवार का एक लौता बेटा जो था , बचपन से ही हर मुँह माँगी खवाइश पूरी होती आयी। शान शोहरत में तो कहीं दोस्तो की संगति में , में एक आवारा बेटा बन गया था।

करिश्मा बाइक लेकर फुल स्पीड में तीन सवारी घूमना, पुलिस पकड़े तो दादाजी का नाम आगे करना। अर्थात बिंदास इधर उधर के काम करता था, पता था दादाजी की प्रतिभा के कारण मेरा बुरा हाल नहीं होनेवाला। पर एक बार नये आये एसपी इंस्पेक्टर ने रिश्वत के मामले में मुझे थाने पकड़ कर ले गये थे, पाँच मिनिट के अंदर ही दादा ने कॉल पर कमिश्नर से बात करके जमानत करवा ली। पर उस दिन पापा और दादा की बहुत दाँट पड़ी थी। 

"सुधर अब तो सुधर... इसके बाद ध्यान रखना आगे से हम सिफारिश नहीं करेंगे।"

"ऑफहो.... साले नये पुलिस की ऐसी की तैसी। आप बदली करवा दीजिए उनकी।"

हम ऐसा कुछ नहिं करेंगे। आगे से तुम ध्यान से रहना समझे।

स्कूल से लेकर कॉलेज तक पास भी महेनत से या पढ़कर थोड़ी हुआ?? जो टीचर पैसे से माने उनको पैसे देकर जो न माने उनको धमकी देकर ... लोग अन्ना भाई बुलाते थे मुझे।

ओहो ! कही तो इनका करैक्टर डॉन जैसा तो कही जोरदार और दिलचस्प लग रहा था, मेने पूछा,  "फिर इतना बदलाव कैसे?"

इतने में ही चाचा ने चाय खत्म होते ही अंकित भाई की पुरानी फ़ोटो दिखाई।

सच में अभी के और पुराने हुलिये में जमीन आसमान का अंतर था। बड़ी तगड़ी सोने की चैन और ब्रेसलेट, आँखों में रोमियो जैसा चश्मा , लंबे बाल और दाढ़ी- मुछ और हाई फाई गाड़ी।

ख़ैर तो आज ऐसे कैसे? सिंपल, डैशिंग, नॉर्मल शूट बूट में??? अब तो प्रीतेश ने भी क्यूरियोसिटी से पूछा

हल्के से हँसते हुए बोले एक चाटा और एक जिद्द।

"क्या समझे नहीं ," 

बताता हूँ,,, थोड़ा पानी मिलेगा।

मेने तुरंत अपनी पर्पल बोटल आगे कि, पानी पीने के बाद वो बोले,

इकत्तीस दिसंबर 2009 के न्यू ईयर पार्टी के शाम की बात है। मेरे मित्र राकेश और पार्थ का फ़ोन आया। ये दो मेरे जिगरी दोस्त साथ मेरी दुनिया थे, सारे जश्न मेरी बाइक या गाड़ी से तथा हमारे फार्म हॉउस पर मेरे पेसो से ही अधिकतर होते रहते। दोस्ती के सामने पैसा कौन देखता शायद वफादार दोस्त था में।

आज रोशन क्लब में 11 बजे मिलना है, 31 दिसम्बर जो है पर तू थोड़ा घर से 9 बजे ही निकल जाना , सिटी से हमको लेते हुए थोडे गप्पा मारते हुए यहां घूमेंगे हम दोनों साथ ही है यहाँ नरोडा कृष्णनगर हाइवे पर। पार्थ इतना बोलकर फ़ोन कट कर दिया... टू.. टू।।।

इस तरफ मेरे घर पर मेरी आवारगी के कारण पिताजी से लड़ाई और वही दादाजी और माँ का भी समझना चलता रहता था, पर अब क्या करे हम आदत से मजबूर हो गये थे। 

पर इस बार पापा ने मुंह से नही डायरेक्ट स्टेप ही ले लिया जिसका मुझे स्वप्न में भी अंदाजा नहीं था।
हाँ उस दिन में घर से निकलने गाड़ी की चावी लेने गया तो वो उस जगह नहि थी। मेने माँ से पूछा, तो उसने इशारा किया पिताजी की तरफ़।
पिताजी से पूछा, तो बोले आज के बाद रात तक देर से घर से बाहर जाना बंध और चावी मेरे पास है, जो नहीं मिलेगी।

मेरा दिमाग सनक गया ये क्या एकदम से???

कोई नहीं बाइक ले जाऊंगा। देखा तो उसकी चावी भी नहीं... पापा ये क्या मजाक है लाओ चावी दो मुझे??? में गुस्से में बोला।

नहीं मिलेगी बोल दिया न! पापा उसी शांति से बोले

मेने चिल्लाना शुरू किया, उतने में क्या हुआ देखने दादाजी कमरे से बाहर आये, ख़ैर दादाजी ने भी पिताजी का साथ देकर उम्मीदे तोड़ दी।

झगड़ा बढ़ रहा था, पापा बोले किस हक़ से तू इतना अधिकार जाता रहा,??? Heenn!???इस घर में एक चम्मच तक नहीं है तेरी बसायी हुई। बाप-दादा की मिलकत से ऐश कर रहा है.... खुद ने क्या किया आज तक????

आप भी तो वहीं कर रहे है। मेने भी मुंहफट होते हुए गुस्से में कुछ भी बक डाला।

फिर तो लपक कर एक चांटा खींच के मार और कहा," नालायक निकल जा इस घर से"।

मेरा भी जवानी का जोश, एक पल सोचे बिना पहने कपड़े ही निकल गया। जब तक खुद का घर , गाड़ी, बंगला न खरीद लूं मुंह नहीं दिखाऊंगा।

माँ की आँखों में आँसू थे पर पिताजी को लगा दो दिन घर से बाहर बिन पैसे रहेगा तो चुपचाप तीसरे दिन वापस आ ही जाएगा, सावित्री तू रो मत।

में नहीं आऊंगा... देख लेना पापा। उसी दिन आऊंगा जिस दिन मेरी हैसियत न बन जाए। बचपन से ही जिद्दी जो था।

अब मेरी उम्मीद थी मेरे मित्र, में सीधा उनके पास गया सब बाते विगत से बतायी। उस दिन मुझे पता पड़ा दोनो मुझसे नहीं मेरे पेसो से प्यार करते थे। दुनिया का स्वार्थ भरा रंग में पहेली बार देख रहा था। दोस्त के धोखे वाला दूसरा झटका सहने ही हिम्मत नहीं थी। में आया सीधा कालूपुर स्टेशन, जो भी ट्रैन लगी थी चढ़ गया। एक हारा, थका पता नहीं कोनसी ट्रैन कोनसे डिब्बे में यूही नीचे सो गया।

सुबह उठा तो ट्रैन में चहल पहल थी और एक स्टेशन पर रुकी हुई थी। मन किया तो वही उतर गया। देखा तो नवसारी स्टेशन था। अब जेब में पैसे तो थे नहीं, मेने अपनी सोने की अंगूठी बेच दी जो उस वक्त एकमात्र गहने के रूप में मेरे हाथों में थी। क़रीब 25 हज़ार जितने रुपये आ गये पर ये तो मुश्किल से 25 दिन ही चल सकते। यानी अब जरूरी था मुझे नोकरी या कोई काम ढूंढना जिसकी खोज मेने शुरू की। अब ये कोई गुजरात का अहमदाबाद तो था नहीं जहाँ नाम मात्र से काम हो।
नोकरी में हर जगह डिग्री माँगते थे, अब यहाँ न मेरे दादाजी की पहचान काम लगने वाली थी न मेरी कोई रिश्वत देने की क्षमता थी। आज तक तो सारे काम इसी दम पर करता आया था पर अब पस्तवा था और दुःख भी की, मेने अपने बलबूते पर काश कुछ हासिल किया होता। जिन कागज के टुकड़ो को खुल कर उड़ाता था आज एक एक रुपये की कीमत समझ आ रही थी। जी हाँ , वो एक एक दस किलो की बोरी को उठाके उस किराने की दुकान में पटकने के सिर्फ पचास रुपये मिलते थे, और बक्शीस में ढेर सारी थकान। 😢 
फिर भी एक अपनी महेनत की कमाई का अलग ही सुकून था जो सब थकान पर भारी था। हाँ मेरा पहला काम मजदूर वाला था और वो भी मेने बराबर किया जिसका नतीजा यह हुआ की उस किराने की दुकान वाले नीरव शेठ को मेरे पर विश्वास बैठा और उन्होंने मुझे वहाँ केश काउंटर पर जॉब करने की ऑफर दी। लगा किस्मत को आखिर रहम आयी। ईमानदारी ने उनका विश्वास इस कदर जीत लिया की उन्होंने कुछ डील के लिए भी मुजे भेजना शुरू किया। जैसे कि वो एक किराने की दुकान थी। और काजू की डील करने कई बार गोवा जाना होता। वहाँ का  एक डीलर बार बार मुझसे मिल काफी परिचित हो गया और शायद दोस्त भी। उस ने गोवा में ही मुझे काजू के बिजनेस के एजेंसी की ऑफर दी, में वहाँ की जॉब छोड़ गोवा शिफ्ट हुआ। इन दौरान ये अशोक चाचा जो आपके सामने है उनकी मदद से इसको गुजरात में शुरू किया। मोहिनी के (उस वक्त मेरी गर्ल फ्रेंड अभी की पत्नी) सपोर्ट और हिम्मत से में गुजरात फ़िर वापिस आया पर इस बार में अकेला हारा थका नहीं पर मेरे साथ बढ़ते कदम स्वाभिमान साथ कामयाबी एवं आत्मविश्वास से भरपूर थे। 

"क्या क्या नाम बताया ?? "

जी मोहिनी।

जब वो मोहीनी बोले तब मेरे चहरे पर स्माइल आयी क्या इत्तफ़ाक रहा, पर अभी तक प्रीतेश के अलावा मेरा नाम उनको पता नहीं था।

" जी ... ख़ैर आगे....बताइए।"

और उसी आत्मविश्वास के चलते गुजरात में 'दिन दुगना रात चौगुना' के जैसे बिजनेस ऐसे बढ़ा साथ नाम भी। और इसमें साथ महत्त्वपूर्ण सहयोग देनेवाली थी, मेरी पत्नी मोहीनी।  हाँ , जब गोवा शिफ्ट हुआ तब एक गुजराती फैमिली आया था ख़ैर मेरी लव स्टोरी की भी एक अनोखी दास्तान है समय कम पड़े या समझ लो में उसे अपने तक ही सीमित रखना चाहता हूँ....,
शायद कबसे सूरत क्रोस कर चुके है अपन किसिको सोना नहीं है?? ट्रैन काफ़ी खाली है, हम लोगो का सोचते हुए वो बोले।

"नहीं नहीं , नींद उड़ गई है...लव स्टोरी आपकी मर्जी हो तो ही बताना हम नही पूछेंगे शर्त के मुताबिक।" हम बोले।

वैसे भी उनने बात शुरू करने से पहले ही एक शर्त रखी थी,  सबकुछ पूछना पर एक बात मत पूछना? वो है मेरी लव स्टोरी।

और हम लोगो ने भी वो शर्त मंजूर की थी। उसके चलते चाहते हुए भी कुछ नहीं पूछा।

"तो आप अभी अहमदाबाद में अपने घर पर रहते हो???" 

जी नहीं।

"क्यो?" प्रीतेश बोला

अरे!! अगाल सु थयूं ऐ तो के अंकित। चाचा जी उनकी मातृभाषा गुजराती में बोले।

हाँ चाचा जरूर, सुनो जिस दिन में गुजरात वापस आया तब दो मेरे बाजुओं के हौंसले थे , एक यह मेरे अशोक चाचा और दूसरी मेरी धर्म पत्नी जो उस वक्त मेरी गर्ल फ्रेंड थी।
बीस दिनों में मेरे बिजनेस का इतना नाम हो गया था साथ मोहीनी एक लेखिका थी और उसके कई अखबार और मेगेज़ीन से कनेक्शन था उसने वो हर न्यूज़पेपर और मेगेज़ीन में बिजनेस एडवर्टाइज और अचीवमेंट छपवाया जो मेरे पिता जी ने भी पढ़ा। वो , दादाजी और मम्मी मुझसे मिलने साथ घर ले जाने आये।

पिताजी मुझे सफल देख सबसे ज्यादा बेहद ख़ुश थे। उनकी आँखों में आँसू थे। तुज पर आज नाज है। ये मेरा बेटा है!!

मुझे तो यकीन था मेरा लाल एक दिन जरूर कामयाब होगा, माँ भी भरी आँखों से बोली।

बोले चलो घर बेटा , एक फोन तक नहीं किया कभी, तुम्हारा कोई अता पता नहीं था इतनी नाराज़गी। पिताजी आजिजी करते हुए बोले।

नहीं पापा अभी तो ऑफिस और गाड़ी ही ले पाया बंगला लेना बाकी है।

बेटा वो बंगला तुम्हारे नाम पर ही है। अब जिद्द छोड़ कर घर आओ। दादाजी भी समझाते हुए बोले।

मेने सबके चरण छुए आशीर्वाद लिए पर उनके कितना मनाने के बाद भी अपने संकल्प को पूरा करके ही घर में कदम रखूंगा यह साफ़ बता दिया। शायद वो जख्म भर नहीं पाए थे।

तब उनकी मुलाकात मोहीनी से भी करवाई। पहेले तो श्यामल मोहीनी सबको कम पसंद आयी पर धीरे धीरे उसने सबका दिल जित लिया। शायद सच्ची कैरिंग और हेल्प से आप किसी के भी दिल को जीत सकते हो , ये में मोहीनी से सिखा। हाँ, उसने मुझे भी समझा और परिवार वालो को भी। वो सच में एक अच्छी और संस्कारी लड़की थी न जाने कैसे मुझे मिल गयी थी!!☺️

मोहीनी मेरे दादाजी वाले घर मिलने आने जाने लगी शायद हमारे बीच रिश्ते के धागों को मजबूती से जोड़ना चाहती थी वो और वाकई में उसने ये कर दिखाया। हमने कुछ ही महीनों में खुद का घर भी ले लिया जो बिलकुल मेरे घर से पाँच मिनिट वाकिंग पर था। मोहीनी ने ही ऐसे पास लेने पर दबाव डाला था। सच में वो एक संस्कारी लड़की थी सुंदर कम थी पर गुणवान और टैलेंट से भरपूर, जो समय के साथ परिवार वाले भी समझ गये। खुशी खुशी सबके आशीष से हमारी शादी हो गयी।
उसने ही समजाया उस दिन पापा ने चावी दे दी होती तो क्या आप आज यहाँ होते?? 

बात तो उसकी सही थी...कभी नहीं होता... वो ही आवारा गर्दी चल रही होती सब सोच पापा से सारी नाराजगी पूर्णतः चली गयी।खुशी खुशी घर पर आते रहते। परिवार के ही आशीष से हम अलग समीप के निजी बंगलो में रहते है।

आज बहुत दिन बाद किसिको यह सब बताया कहते उनकी आँखों में आँसू आ गये। तो कही मेरे और प्रीतेश की आँख भी नम थी। मेरी आँखे अपने इमोशनल नेचर के कारण और प्रीतेश की उनकी पिता को दी हुई नाराज़गी के कारण। 

"देखा, मणिनगर स्टेशन आ गया। मेने बोर्ड पढ़ते हुए बोला"

ओह्ह !! हम लोगो को यही उतारना है। अंकित जी फटाफट सामान निकलते हुए बोले।

तो आप यहाँ मुंबई क्यो आये थे ? और मोहीनी जी साथ क्यो नही है? शायद उनके जाते जाते यह मेरा अंतिम प्रश्न था जो पूछ लिया गया।

जी हम लोग एक्चुअल में गोवा गये थे बिजनेस रिलेटेड और मुंबई यूही दो - तीन डील के कारण मीटिंग थी बेग को निकालते हुए वो बोले। और मोहीनी प्रेग्नेंट है तो मेम साहिबा का आने का सवाल ही नही था?☺️

"वाह बधाई हो आपको।"

जी धन्यवाद।

आपका नाम?

"मोहिनी"

वाह ! ये इत्तफ़ाक भी बड़ा अजीब है। ये नाम् तो मेरे लिए बहुत स्पेशल है। वैसे आप मेरी वाली मोहिनी से ज्यादा सुंदर हो आप आपको उससे भी मिलकर ख़ुशी होगी...खैर लीजिए ये मेरा कार्ड कभी भी आ सकते है आप। मिठाकली छह रस्ते पर ऑफिस है। कभी भी अहमदाबाद में कोई भी दिक्कत आये तो भी जरूर बताना, आपकी प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए अब दादाजी के नाम की जरूरत नहीं मेरा अपना ही नाम काफ़ी है।☺️🙏 आत्मविश्वासपूर्वक कार्ड हाथ में थामते हुए वे गेट से उतर कर हमारी खिड़की की तरफ़ आ गये शायद अंतिम बार बाय करने।

अनजान से भी कभी कभी अजीब अपनापन हो जाता है। शायद कुदरत ने ही हम सब को ऐसे मिलाया था ऐसा ही सब खयालो में चल रहा था।

मेने खिड़की से शिर निकलने की कोशिश करते हुए कहाँ की मुझे बहुत बहुत कुछ सीखने मिला आपकी जीवनी से। इत्तफ़ाक से अभी जैसे मिले किस्मत रही तो आगे भी मिलेंगे और आप वाली मोहीनी जी को मेरा प्यार भरा नमस्कार जी। यह सफ़र मेरा अभीतक के सफ़रो में यादगार रहेगा क्योंकि ये मन पर अंकित हो गया है अंकित जी एक श्वास में , में फटाफट बोल गयी।

प्रीतेश ने भी अपना भाव व्यक्त कर दोनो से खिड़की के बाहर हाथ निकलते हुए उन दोनों से बारी बारी से मिलाये... रियली nice to meet you and talk to you... this is my card , next टाइम मुम्बई आओ तो आप भी घर पर जरूर आना। इतने में ट्रेन होले होले शुरू हो गयी.... तो भी प्रीतेश के अव्यक्त भाव व्यक्त हो ही रहे थे, आज में समझा 'जो होता है अच्छे के लिए होता है' जीवन में ..... और तो और आज में ये भी समझ गया बड़े जो भी करते है अपने लिए, उसमें अपना हित ही छुपा होता है और उनका उद्देश्य भी तो अपने को सही मार्गदर्शन साथ आगे बढ़ाना है। थैंक्स मुझे भी मेरे पापा से मिलवाने के लिए, चिल्लाते हुए प्रीतेश उन तक आवाज जाए ऐसे बोल रहा है क्योंकि ट्रैन की गति बढ़ चुकी थी ।

कालूपुर स्टशन आते ही हम दोनो भी उतर गये।

"चलो में पहले मामा जी को बता दु वो चिंतित होंगे।"

प्रीतेश ने पल गवाएं बोला तुम रहने दो मोहीनी, में बात करता हूँ, आखिर माफ़ी भी तो मांगनी है। 

"सही है मेने भी ख़ुशी से उसको हौसला दिया।"

हेल्लो पापा, जय जिनेन्द्र चरण स्पर्श।

बोलो बेटा अच्छे से पहुँच गये आप दोनों? कोई दिक्कत तो नहीं आयी? मोहिनी ठीक है?

जी, पापा अच्छे से पहुँच गये है, एंड सॉरी पापा वो आपसे जिद्द करके आया आपको हर्ट किया।

बेटा , तुमको इसका अहसास हुआ और दिल से क्षमा मांगी वही बड़ी बात है, वैसे एक बात याद रखना माता पिता तो बच्चों को माफ़ी मांगने से पहेले ही माफ कर चुके होते है। 

यह बातें स्पीकर से में भी सुन रही थी... सच में इस सफ़र ने  बहुत कुछ सिखाया था, साथ में मुझे अपने मम्मी पापा की आज्ञाकारी बेटी बना दिया था।


धन्यवाद...💐

- *प्रियंका (पंखी)*✍️😇☺️