फूल जितना नहीं केवल
पंखुरी भर प्यार दो ,
अपनी उंगलियों से
चेतना को झंकार दो,
बादलों की तरह झुककर
अंतहीन फुहार दो ,
एक यादों से भरा मंडप बना लेंगे
इस जीवन को प्रेम का सागर बना लेंगे ।।।
साथ चल पड़े तुम जो मेरे,
मुश्किलें राह मोड़ लेंगी,
सामने आकर जो मेरी
बाहं को तुम थाम लोगे ,
बहकर नदियां के जैसी
तरल मै हो जाऊंगी,
बस इतना ही मुझे अनुमान दो
बादलों की तरह झुककर अंतहीन फुहार दो ।।।
तुम साया बनकर साथ रहना,
मै छाया बनकर साथ चलूंगी,
कसम उठाना अपनेपन की
खुशियां गम मिलकर सहना ,
बसंत की बसंती हवा में,
सावन की हरियाली में,
मेरी कल्पनाओं के महासागर में,
अपनेआप को आकर तो दो ,
अपनी उंगलियों से चेतना को झंकार दो ।।।
बादलों की तरह झुककर अंतहीन फुहार दो,
एक प्रेम से भरा मंडप बना लेंगे,
इस जीवन को प्रेम का सागर बना लेंगे ।।।
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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