बारिश की बूंदे जब धरा पर गिरती
सौंधी-सौंधी मिट्टी की खुशबू बिखेरती ।।
बारिश की ये बूंदे खेतों को हर्षाए
चहूंओर हरियाली ही हरियाली छा जाए ।।
बूंद-बूंद जैसे धरा पर अमृत समान
सज गयी वसुधा, तू देख आसमान ।।
बूंद-बूंद बारिश की, दे "जिंदगी का फ़लसफा"
मिले खुशी तू संजो ले, गम कर तू रफा-दफा ।।
बारिश की बूंदों से ,बने जल की धार
बूंद रूपी विश्वास,करे जीवन साकार ।।
जलधार मिल बहे, हो नदिया की धार
निश्चल सतत गति ,हो जीवन आधार ।।
निरंतर प्रवेग से नदियां बहती,न रूकती न थमती
विपत्ति के थपेड़ों से लड़, तू बढ़ इंसा को कहती ।।
बूंद-बूंद से जलधार बने , धार-धार से नदी
नदियां मिलकर जा मिले,अथाह समुद्र-सी वेदी ।।
समुद्र की गहराई न जाने,अपार विशालता न कोई मापे
गहन-विचार,मनन-चिंतन,जीवन में इंसा को सिखलाये ।।
बूंद-बूंद बारिश की ,दे "जिंदगी का फ़लसफा"
मिले खुशी तू संजो ले,गम कर तू रफा-दफा ।।
✍️मनीषा भुआर्य ठाकुर
कर्नाटक

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