निर्झर धीर गंभीर
बहती जाती कल कल
के मधुर गीत सुनाती
अनेको फूलो के जड को
छूँती चमन की खुश्वू
फैलाती आती
झर झर झरना तू
सुरमयी पवन बटोरे
कानो मे कुछ कह जाती
ऐसा मधुर गान गाती
वादियो मे गूँजती ध्वनि
अंतरिक्ष को छूँ जाती
ऐसा संगीत सुनाती
झरने की शीतलता से
मन शांत ,और
प्रकृति को कोटि कोटि
नमन करता है
अनुपम छँटा देख कर
ईश्वर की चित्रकारी को
प्रणाम करता है ।
मीनाक्षी शर्मा

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