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एक स्वप्न संजोया आंखों में,
बच्चों ने जन्म लिया था जब,
क्या खूब सजाया घर को,
क्या खूब मिठाई बांटी थी,
एक जश्न मनाया जी भर के---
दौलत क्या खूब लुटाई थी,
बच्चों के जन्म दिवस पर---
जी भर कर खुशियां मनाई थी,
मां-बाप की आंखों के तारे---
जब बच्चे बन जाते हैं,
यह जिगर के टुकड़े---
जीवन के सहारे बन जाते हैं,
उनकी उम्मीदों का अक्सर---
गला क्यों घुट जाता है,
बुढी होती है जब माता---
पिता बुढा जब हो जाता है,
उसके पालन-पोषण में---
कोई कमी नहीं आने देते,
कमा कमा कर पाई पाई को---
बच्चों पर जान लुटा देते,
बच्चों के सपनों को---
पूरा करने की रस्म निभाई थी,
हंसते-हंसते ये फर्जी की रीत---
मां-बाप ने निभाई थी,
बच्चों की सपनों की खातिर---
खुद को अनदेखा कर जाते हैं,
उनके भविष्य की खातिर---
मेहनत में जुट जाते हैं,
मां की सारी उम्र---
रसोई में गुजर जाती है,
और पिता की भविष्य की---
चिंता में निकल जाती है,
परवरिश करते करते---
ना जाने कब पंख लगाकर---
जवानी उड़ जाती है,
छा जाती बालों में चांदी---
आंखें बूढी हो जाती है,
जीवन एक संघर्ष है---
सब जीने का बहाना है,
अपना कर्तव्य खुशी खुशी---
जीते जी निभाना है,
संगीता वर्मा✍✍

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