एक बनाए भगवान ने पुतले।
एक बनाये इन्सान ने।
समानता बस इतनी।
देखने में लगे एक जैसे।
भगवान अपनी ।
मर्जी से चलाता इन्हें।
इन्सान अपनी ।
मर्जी से सजाता इन्हें।
भगवान के पुतले ।
चलते हँसते बोलते हैं।
दिल में दर्द हो तो।
आँसु भी टपका देतें।
इन्सान के पुतले ।
बिना पहचान के।
ना सांसे ना आहे।
ना मुश्किलें कोई।
बस इतनी सी ।
जिंदगी इनकी।
सजे रहे मन से।
बिना आहत हुए।
इन्सान इन्हे बनाते बनाते ।
स्वय भी पुतला बन गया।
ढल कर नये नये रंगों में।
अपना अस्तित्व ही बदल लिया।
ना किसी के दुख दर्द ।
पढ़ना चाहता है।
ना अपने सुखों में किसी को।
शामिल करना चाहता है।
सबकी अपनी चाहतें।
अपनी अपनी इच्छाएं।
पूरी हो जाए किसी तरह से।
चाहे कुरबान कोई भी हो जाए।
इनकी बला से।
नीलम गुप्ता 🌹🌹(नजरिया )🌹🌹
दिल्ली

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