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एक ख्वाब देखती हूं बेहिसाब देखती हूं,
नैनो को बंद करके बार-बार देखती हूं,
सुबह सवेरा हो या रात रैन बसैया,
नैनो मे तुम समाये, पार लगा दो मेरी नैया,
तुम बिन लगे है सूना, मेरे कृष्ण कन्हैया,
बस मोह है तुम्ही से निर्मोही हो गई हूं,
तन मन की सुध नही है---
सपनों में खो रही हूं,
मन्दिर मे ढूंढती हू गलीयो मे ढूंढती हूं---
यह जानती हूं दिल में तुम बसे हुए हो,
फिर भी ना जाने क्यों मैं बावरी सी हो रही हूं,
लग्न लगी है तुमसे ये ख्वब देखती हूं,
बार बार देखती हूं दिन रात देखती हूं,
संगीता वर्मा✍✍

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