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इक बचपन का जमाना था। 
जिसमें खुशियों का खजाना था। 
ना कोई डर था, हर तरफ ठिकाना था। 

बचपन की मौज थी, जिंदगी हर रोज थी। 
ना कोई घुटन थी, हर तरफ छु अन थी। 
इक प्रेम बिखरा था, " छु अन " भी पावन थी। 

वक्त ने करवट ली, मौसम भी बदला है। 
"था और है" में वक्त बहुत बदला है। 
अब ना वो शहर रहा, ना वो पावन छु अन रही।। 

अब " बचपन " भी घरों में कैद! 
बाहर रिश्तों में भी अमानवीयता छाया है। 
खुशियों का खजाना ढूढनें, फिर! 
बचपन मुस्कुराया है। 


       श्वेता कर्ण! 
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