जन्म हुई इस धरा पर आईं, 
मातृ ऋण विमुक्त हुई।
लक्ष्मी उपमा थी किन्तु, 
ना सोहर ना उल्लास हुई।

प्रथम कली मै आंगन कि, 
कांक्षा की स्वप्न अधूरी।
संसृत में बाला की आदर, 
जैसे है मृग की कस्तूरी।

जन्मोत्तर से भाव पराई, 
अन्यालय ठिकान मेरा।
देव सृष्टि की संरचना में, 
चंचल है स्वभाव मेरा।

अपने चंचलता से, 
सब के मन को भायी थी।
कोमल पंखुड़ियों सी, 
परी सी राजकुमारी थी।

रीझ रही मै सपनो में, 
अकल्पनीय विचारों से।
स्वयं अस्ति की संचय , 
श्रम शीला के आधारों से।

सतेश देव पाण्डेय