12  फरवरी 1825 टंकारा ग्राम गुजरात में मूल शंकर का जन्म हुआ था। बाल्यकाल से ही मूल शंकर कुशाग्रबुद्धि के थे। सत्य की खोज में  19 वर्ष की आयु  में वैराग्य भाव उत्पन्न हो गया। संन्यास की दीक्षा दन्डी  स्वामी पुर्णानंद जी ने देकर दयानंद सरस्वती नाम दिया था। स्वामी दयानंद ने भारतवर्ष में भ्रमण करके समाज की यथास्थिति का गहन मूल्यांकन किया था। गुरु दंडी स्वामी ने स्वामी दयानंद सरस्वती को वेदिक ज्ञान विज्ञान से संबंधित जानकारी प्रदान की है। महर्षि दयानंद सरस्वती ने पूर्ण शिक्षा के उपरांत दीक्षा के रूप में गुरु जी को एक मुट्ठी लौंग दी थी। उसी दौरान गुरुजी की आंखों में गंगा -यमुना बहने लगी। स्वामी दयानंद सरस्वती ने गुरु जी से पूछा क्या हो गया ? तभी गुरु दंडी स्वामी ने कहा कि मुझे एक मुट्ठी लोंग नहीं, मुझे आप का संपूर्ण जीवन भारत वर्ष की सामाजिक, सांस्कृतिक ,राजनीतिक एवं आर्थिक,परतन्त्रता से आजादी के लिए चाहिए ।स्वामी दयानंद सरस्वती ने गुरु का आदेश शिरोधार्य करके वेदों की तरफ लौटने का आह्वान करते हुए, भारतवर्ष के उद्धार के लिए 1875 में आर्य समाज का गठन मुंबई में किया था।  महर्षि दयानंद सरस्वती वेद उद्धारक एवं समाज सुधारक थे। वे वेद को ईश्वर की वाणी मानते थे। वेदों को सत्य सनातन धर्म का चिरंजीव ज्ञान एवं विज्ञान, धर्म ,अध्यात्म ,दर्शन और मानवीय मूल्यों का आधार बताया है। उन्होंने कहा वेदों का अध्ययन -अध्यापन करना,करवाना सभी आर्यों का परम कर्तव्य है ! महर्षि दयानंद अज्ञानता ,पाखंड ,बुराइयों और गलत परंपराओं पर चोट करते थे। साथ ही ज्ञान तरह विज्ञान, विद्या और धर्म को विवेचनात्मक धरातल पर मीमांसा के रूप में मानते थे।  वे धर्म वेता और राष्ट्रवाद के उन्नायक थे । दलित, पीड़ित, शोषित एवं अनार्यों को ज्ञान के रास्ते पर चलने के लिए संघर्षरत आंदोलनकारी थे। हिंदी , संस्कृत देवनागरी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने वाले संस्थापक थे। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के प्रति जागृति ,विधवा विवाह के प्रति समाज में सम्मान स्थापित करना शास्त्र सम्मत माना है। वे भारत में वैदिक गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति को स्थापित करने के लिए पुरजोर प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेद आदि भाष्य भूमिका के साथ लगभग 40 पुस्तकों की रचना और अनेकों शास्त्रार्थों के जरिए वैदिक परंपराओं को पुनः स्थापित किया। उन्होंने उन्होंने वेद को सत्य ज्ञान और विद्या का आधार बताया है। वह अपने उद्देश्यों उद्बोधन और प्रवचनों में वेद की विद्या को प्रमुखता देते थे। वेद पर जोर देते हुए वह कहते हैं, वेद ऐसा दिव्य ज्ञान, विद्या और विज्ञान के उद्गम और आधार स्तम्भ हैंजो सम्पूर्ण विश्व के उद्धार करने में सक्षम हैं। महर्षि दयानंद किसी मत, पंथ, संप्रदाय या संस्था के स्थापना करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने समाज सुधार करने के लिए ही आर्य समाज को आंदोलन के रूप में चला कर के समाज में गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार मानव जाति की पहचान करने का आधार बनाया था ।वेदों में चारों वर्णों, चार कर्म और चार आश्रमों का विधान है ।उसी से संपूर्ण मानव जाति का उद्धार सम्भव है। ऋषि दयानंद ने सब की उन्नति में मानवीय गुणों को अपनाने पर जोर दिया। मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए उन्होंने अपने जीवन में विरोधियों, हत्यारों और नफरत करने वालों को क्षमा किया था ‌। जिसने उनको भी जहर दिया, उसको भी पैसे देकर के दूर जाने की सलाह दी थी। उनका जीवन, उनके कार्य, उनकी दी हुई शिक्षा, आज के समाज के लिए अत्यंत उपयोगी एवं कल्याणकारी है और आगे भी रहेगी।





                   वंदना शर्मा