आज क्यों हम दुखी हो रहें ?
क्यों अश्कों की बहती धार।
कुदरत की कहर देखकर हम
क्यों हो रहे हैं अति बेहाल।
अब तो हमको सोचना होगा
केवल प्रकृति नहीं जिम्मेदार।
इस दुखद त्रासदी के कहीं ना कहीं
हम स्वयं भी है जिम्मेदार।
आज डर गए हम देख दुखद प्रकृति का कहर।
लेकिन सोचो जरा।
इतना भयावह देख कर डरावना मंजर।
पर्वत धरती घाटी तक का कर लेते हम दोहन।
निज स्वार्थ में काट डालते हरे भरे सारे वन।
कांप उठा हर हृदय देख कर
अति भयावह मंजर।
लील गया जानें कितनों का
आया बन कर कैसा कहर??
प्रकृति के जोर के आगे मानव भी हुआ मज़बूर ।
इस विपदा की वजह में मानव का भी तो है कसूर।
जब तू चीरेगा प्रकृति का सीना
तो जान ले ......
दूभर हो जाएगा तेरा भी जीना।
जो खेलेगा प्रकृति से करेगा खुद का नाश।
रौद्र रूप धारे जब होगा धरा पर महा विनाश।
संभल जा मानव मत कर अब तू
धरा पर यूं प्रहार।
प्रकृति करती आगाह तुझे तू मत कर अत्याचार ।
मर्म धरा का ना समझा तो प्रलय धरा पर आएगा।
रोएगा तड़पेगा लेकिन तू कुछ ना कर पाएगा।
बस पीछे पछताएगा।
आओ।आज करें हम वादा।
वृक्ष लगाएं सबसे ज्यादा।
नदियों को ना करें प्रदूषित।
प्रकृति को मिल करें पोषित।
प्रकृति की रक्षा हमारा धर्म हो।
नेक कर्मों को अपनाएं तभी तो
खुशहाल हम सबका जीवन हो।
यही हमारा वादा है ।।
नेक नियति का इरादा है।
*** मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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