आखिर हल्कू की अच्छी खासी फसल नष्ट हो गयी। रात भर फसल बचाने के बजाये हल्कू सोता रहा। मवेशियों ने अच्छी खासी फसल खा ली। जबरा की कर्तव्यपरायणता और हल्कू की बेबकूफी गांव में चर्चा का विषय बन गयी।

    "अरे हल्कू। सुना है कि रात में फसल मवेशी खा गये। तुम कहाॅ थे।" पंडित दातादीन कुछ इस भाव से बोले जैसे कि उन्हें कुछ पता ही नहीं है। मन ही मन हल्कू की बेबकूफी पर जमकर हसे।

    "पांय लागन पंडित जी। था तो कल यहीं पर पर जग नहीं पाया।"

   "पर जबरा ने तो भोंक भोंक कर पूरे गांव को जगा दिया। और एक तुम थे कि चादर तान सोते रहे।"

   शायद हल्कू को इसी का इंतजार था। पूरा गांव जबरा की आबाज सुन रहा था फिर कोई आया क्यों नहीं। सही बात है कि पूस की कङाके की सर्दी में किसको पङी कि अपने गर्म कंबल से निकलकर बाहर निकले। एक बेचारा किसान, सर्दी में अपनी फसल बचाने को रात भर जगे। एक कंबल का जुगाड़ भी नहीं। हल्कू को अपने फैसले पर अब कोई अफसोस नहीं था।

    "ठीक है पंडित जी। गलती हो गयी। पर आप किसी की जिम्मेदारी नहीं थी कि आकर देख ले। फिर झूठी सहानुभूति दिखाने की क्या जरूरत।"

   पंडित दातादीन अपना मुंह लेकर चलते बने। थोङा आगे बढकर रुके। फिर वापस आये।

   "हल्कू। तुम ब्राह्मण की ताकत को हल्के में लेते हो। ब्राह्मण की नाराजगी से खुद भगवान भी नहीं बचा सकते। "

" अभी तक मैं भी यही समझता था। भगवान की खुशी के लिये आपको अपनी फसल का पहला भाग भिजबाता था। हर त्योहार मेरे बच्चों ने मिठाई खाई या नहीं पर आपके पास जरूर भिजबायी। खुद भूखे रहकर आपको समय पर भोग लगाया। अब पंडित जी। ज्यादा मत बुलबाओ। जो होना था सो हो लिया। अपना रास्ता नापो। "

  हल्कू की जली कटी सुन पंडित जी ने अपने मुख से श्राप का पिटारा खोल दिया।
" दुष्ट, पापी। अभी भी तेरी बुद्धि ठिकाने पर नहीं आयी है। अपनी करनी का दंड भुगतेगा। "

  घर पर मुन्नी इंतजार कर रही थी।

" अब इतना काहे झगङ रहे हों। जो होना था सो हो लिया। चलो मुंह हाथ धो लो। कलेऊ कर लो।"

  नाश्ता करके हल्कू और मुन्नी को पूरे दिन फुर्सत नहीं थी। किसान की फसल बर्बाद होकर भी पूरे दिन व्यस्तता थी। कल हल्कू शहर चला जायेगा। दिन भर तैयारी में निकल गया।

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    शहर में हल्कू और मुन्नी को बङी परेशानी हुई। आसानी से काम मिलता कहाॅ है। फिर शहर के कामों में हल्कू होशियार भी न था। एक दिन और फाका निकल गया। नगर पालिका ने एक धर्मशाला बना रखी थी। हल्कू और मुन्नी ने वहीं बसेरा बना लिया। धीरे-धीरे हल्कू को काम मिलने लगा। धर्मशाला से किसी ने खाली कराने को नहीं कहा तो हल्कू को वही खुद का मकान लगने लगा। हालांकि गांव का मकान बहुत बङा था। फिर भी गुजर हो रही थी।

    बहुत खुशामद कर एक फैक्ट्री में मजदूरी मिल गयी। आठ रुपये महीना। इतना तो हल्कू ने कभी देखा भी नहीं था। पर सारा राशन बाजार से लाना होता। मंहगाई ऐसी कि इसमें भी मुश्किल होने लगी। मुन्नी को भी कुछ घरों में झाङू पोंछा लगाने का काम मिल गया। अगर शहर की औरतें कमेरी हो जायें तो बेचारे गरीब तो भूखे मर जायें।

     दूसरों के घरों में काम करती मुन्नी अक्सर आदमियों की गलत नजर का शिकार बनती। कभी इतना मुंहफट रही मुन्नी सहन करना सीख गयी। मालकिन की फटकार और मर्दों की गलत नजरों में भी सहज रहती। महीने के अंत पर मेहनत मिली तो मालकिन ने टूटे कप प्लेट की कीमत भी काट ली।

     हल्कू की फैक्ट्री में नियम तो आठ घंटा काम का था। पर रोज ओवरटाइम कराया जाता था। बारह घंटे की चाकरी हो जाती। मजदूर भी ओवरटाइम के लोभ में ज्यादा काम करते। हल्कू ज्यादा पढा लिखा तो नहीं था। पर महीने की मजूरी कम लगी। हिसाब बनाया। मुंशी जी को बताया। फिर मालिक से शिकायत की। पर मालिक तो भङक गये। 

   "तुम बिना पढे लिखे लोग। हमको बेईमान बताते हो।"

   "मालिक। बेईमान नहीं कह रहा। बस हिसाब देख लेते। तसल्ली हो जाती।"

    "कोई हिसाब नहीं देखूंगा। काम करना है तो ठीक नहीं शक्ल भी मत दिखाना।"

    यह क्या। काम नहीं तो हल्कू खायेगा क्या। चुपचाप मालिक के पैर पकङे। भविष्य में कुछ न बोलने की हिदायत के साथ एक अहसान और मिला कि काम से निकाला नहीं।

     शाम को हल्कू और मुन्नी दोनों उदास थे। बिना बोले बहुत कुछ कह गये। धर्मशाला का चौकीदार छज्जो आता दिखा।
  
    "राम राम दीवान जी।" गांव में चौकीदार को दीवान, दीवान को थानेदार ही बोलते थे। हल्कू अभी भी इनका पालन कर रहा था। तभी तो इतना समय सरकारी धर्मशाला में रहते आये। 

    "देखो हल्कू। तुम आदमी बहुत अच्छे हो। पर क्या है कि धर्मशाला में सात दिन भागवत बैठेगी। कोई बहुत दूर से विद्वान पंडित जी आये हैं। तो अपने रुकने का कहीं और जुगाड़ कर लो।" 

    "दीवान जी। आप तो हमारे माई बाप हैं। कोई ठौर ठिकाना आप ही बताओ।" 

     छज्जो दिल से भला था। पर मजबूर था। फिर भी धर्मशाला के पीछे पनारे के पास थोङी सी जगह पर हल्कू की व्यवस्था कर दी। भागवत आज ही शुरू होनी थी।

   धर्मशाला में बहुत भीङ थी। पंडित जी बहुत अच्छे से कथा कह रहे थे। पर आज कल के पंडितों की तरह भागवत, महाभारत सब गड्डमड्ड कर रहे थे। 

" जब भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव नहीं आये तो युधिष्ठिर उन्हें ढूंढने निकले। तालाब के किनारे चारों मूर्छित थे। यक्ष की आवाज आयी कि तुम इन्हें जिंदा चाहते हों तो मेरे प्रश्नों का उत्तर दो। युधिष्ठिर तैयार हो गये। यक्ष ने पूछा - बताओ युधिष्ठिर। संसार में दुखी कौन है। युधिष्ठिर बोले - यक्ष। संसार में वही दुखी हैं जिसपर धन नहीं है। निर्धन व्यक्ति कहीं भी चला जाये, दुखी ही रहेगा। "

   पनारे के पास मुन्नी खाना बना रही थी। हल्कू ने टुकड़ा मुंह में रखा ही था कि पंडित जी की बात सुन खाना गले में अटक गया। जो सोचकर फसल बर्बाद हो जाने दी, वह कितना गलत था समझ आ गया। परेशानी खेती या मजूरी में नहीं बल्कि दरिद्रता ही उनकी परेशानी थी। 
   
रचनाकार : दिवा शंकर सारस्वत ' प्रशांत'