"समय की मांग हो जैसी
हम वैसी ही बात करते हैं।
जो करे मानव की सेवा,
हम उसकी फरियाद करते हैं।।

कलयुग में सभी फंसे हैं।
दिखावे के मोह पास में।
नहीं फुर्सत किसी को,
ना अपनों से बात करते हैं।।

जो करते हैं चापलूसी,
ना बड़े बुजुर्ग की लिहाज़ करते हैं।
अक्सर हम उसी की बात करते हैं।
"समय की मांग हो जैसी
हम वैसी ही बात करते हैं।।

टूट कर डाली से सुमन 
पाँव तले कुचला गया।
देख कर हम जिसे अनदेखा करते हैं।।
संघर्ष पूर्ण सफ़र से जो,
मंजिल पर पहुंच गए।
कहाँ उसके संघर्षों को याद करते हैं।।

देखकर उसकी सफलता,
हमें भी मिले ऐसी फरियाद करते हैं।।
पर कठिनाइयों से घबराकर
पैर पिछे हर बार करते हैं।
समय की मांग हो जैसी
हम वैसी ही बात करते हैं।

कभी चापलूसी कभी शिकायत 
कभी अपनी ही कामयाबी की
हर किसी से बात करते हैं।
चर्चा औरों की हो, हस्तक्षेप
जन्मसिद्ध अधिकार होता है।।

अपनी बात जब आए
खामोशियों का पहरा,
नजर अंदाज करने का
रिवाज होता है।।"





                   अम्बिका झा 👏